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मानें तो मैं विश्वस्त होकर कह सकता हूं कि इस आदर्श को पाने के लिए स्वशासित सरकार एक शक्तिशाली उपकरण सिद्ध होगा।
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- आप निश्चय ही पूछेंगे तो क्या परिस्थितियों व लोगों की विषमता का इस समस्या पर कोई प्रभाव नहीं? क्या एक स्वशासित भारत के संविधान में विषमता पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है? बेहिचक मैं कहता हूँ कि विषमता पर अवश्य चिंतन हो। भारत के एक सामान्य कांग्रेस राज नेता की सोच लोगों व परिस्थितियों की विषमता को अनदेखा कर किसी सीमा व प्रतिबंध के बिना एक संविधान हो व भारत स्वशासित हो की तर्ज पर है। सज्जनों, इस देश की सामाजिक परिस्थितियों को अनदेखा कर स्वशासित भारत निर्माण होने पर राजनीतिक शक्ति का केन्द्र बिन्दु कहां होगा? क्या आपके विचार में यह अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों के इर्द गिर्द होगा? क्या आप सोचते हैं कि दलित वर्ग के लोगों की इस शक्ति केन्द्र का उत्तराधिकारी बनने की संभावना है? मेरा इस विषय में केवल एक ही सुनिश्चित मत है कि ऐसे स्वशासित भारत में जहां भारतीय समाज के कटु तथ्यों की अनदेखी होगी वहां राजनीतिक शक्ति के तार भारतीय समाज के भद्र, शिक्षित व समृद्ध अर्थात अमीर रईस, शिक्षित व समाज के उच्च स्थान प्राप्त लोगों के पास होंगे। जैसा कि जीवन के हर पहलू में प्रायः होता है राजनीति में भी जीत हमेशा ताकत वाले की होती है। अमीर रईस अपने धन व शिक्षा के बल पर साधन सम्पन्न व सक्षम हो जाएंगे। परन्तु ऊॅंची जातियों के अमीर रईसों को केवल यही लाभ नहीं होगा जिसके विरोध में अल्पसंख्यक और कमजोर समुदाय को राजनीति में अपने हिस्से (भाग) के लिए लड़ाई लड़ना अनिवार्य होगा। इसके अतिरिक्त एक चतुर व गूढ़ वास्तविकता है जिसे सामाजिक निर्धारण कहा जा सकता है। सामाजिक निर्धारण के अंतर्गत कुशलता या योग्य पात्रता के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती इसमें केवल संबंध ही देखा जाता है। एक भारतीय दूसरे वे लोग, जो उसके वर्ग के नहीं है पक्षपात करने को प्रेरित करते हैं। इस निर्धारण का भयानक दर्द अल्पसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक समुदाय के हाथों भुगतना पड़ेगा और वे हमेशा-हमेशा के लिए अल्पसंख्यक समुदाय को राजनीति से बाहर कर देंगे। यह निर्धारण सबसे ज्यादा दलित वर्ग के हितों का विनाशक होगा। जैसा कि आप को विदित है भारत में धर्म के नाम पर जातियों का श्रेणीकरण कर सम्मान देने व घृणा करने का मापक बनाया गया है। इसका प्रभाव निम्नवर्ग के लोगों के मस्तिष्क में उच्च वर्ग