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अनुसूचित जाति फेडरेशन के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने चुनाव अभियान के उद्घाटन के समय जो आरोप लगाए थे, उन्हें उन्होंने परेल के सेंट जेवियर कॉलेज में 22 नवम्बर, 1951 को आयोजित विशाल जनसभा में जोर देकर दुहराया और कहा कि स्वयं उसी सरकार में चार साल काम करने के बाद भी उन्होंने उसे इसलिए त्याग दिया, क्योंकि उन्हें यकीन हो गया था कि कांग्रेस और सरकार अनुसूचित जाति और पिछड़ी जातियों के कल्याण और विकास को लेकर बिल्कुल उदासीन हैं।
भारत सरकार के पूर्व कानून मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने घोषित किया कि श्री नेहरू जान-बूझकर उन आरोपों का उत्तर देने से बचते रहे, जो उन्होंने सरकार और कांग्रेस पार्टी पर लगाए थे, क्योंकि आरोप सत्य और अखंडनीय थे।
पिछले माह सरकार से इस्तीफा देते समय उन्होंने जो बयान जारी किया था उसे गलत साबित करने के कई मौके श्री नेहरू के पास थे, चूंकि प्रधानमंत्री यह अच्छी तरह से जान रहे थे कि सारे आरोप निर्विवाद हैं इसलिए उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा। उन्हें कांग्रेसी नेताओं को करीब से देखने के कई अवसर मिले थे और अब वह आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि दलित पिछड़े वर्गों के लिए कांग्रेस के मन में कोई सहानुभूति नहीं है।
उन्होंने शिकायती लहजे में कहा कि जब वे कांग्रेस सरकार में मंत्री थे तो न केवल उनको उन प्रभारों को नहीं दिया गया जो प्रधानमंत्री ने उन्हें देने का वादा किया था, बल्कि उन्हें नीति-निर्माता कैबिनेट कमेटी से भी बाहर रखा गया।
एक मंत्री रहते हुए वह सरकार की नीतियों की न तो आलोचना कर सकते थे, न ही वह अनुसूचित जातियों के संबंध में कोई प्रश्न पूछ सकते थे।
डॉ. अम्बेडकर ने कुछ कांग्रेसी लोगों द्वारा लगाए गए इस आरोप को खारिज किया कि संविधान निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वहीन थी। यह कहते हुए कि इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता, उन्होंने यह भी जोड़ा कि दस्तावेजी
1 द टाइम्स ऑफ इंडिया, 23 नवंबर, 1951