26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के लोगों के प्रति आदर भाव व उच्च वर्ग के लोगों के मन में निम्न वर्ग के लोगों के प्रति उपेक्षा व घृणा भरना है। ऐसे मनोविज्ञान के तहत दलित वर्ग की राजनीतिक शक्ति के संघर्ष में निश्चय ही विनाशकारी परिणाम होंगे। छूत लोग अछूतों द्वारा एक भी वोट डाले बिना अछूतों के वोटों की हुंडी प्राप्त कर लेंगे और इस प्रकार अछूत न चाहते हुए भी अपने विरोधियों की जीत में योगदान देंगे। अगर सामाजिक तथ्यों को अनदेखा करने का दुष्परिणाम अमीर, रईस, पढ़े-लिखे और समाज प्रभावी शासक जाति बनाना है तो ऐसी होनी को कभी भी न होने देने के लिए हमारे सामूहिक प्रयास को मैं अपना दायित्व समझता हूँ। क्योंकि केवल अपना मालिक बदलना ही हमारा ध्येय नहीं है। मैं कांग्रेसियों से इस बात पर सहमत हूं कि कोई भी देश किसी दूसरे देश पर अपना राज्य नहीं थोप सकता परन्तु मैं पूरे मन से यह कहता हूँ कि यह बात यहीं समाप्त नहीं होती और यह बात ‘‘कि कोई कितना भी अच्छा वर्ग क्यों न हो दूसरे वर्ग/वर्गों पर अपना राज नहीं थोप सकता’’ भी उतना ही सत्य है। मैं धन, शिक्षा व उत्कृष्ट सामाजिक दर्जे की संयुक्त शक्ति को स्थानीय कुलीन’’ का नाम दे रहा हूं। यूरोपियन नौकरशाही और स्थानीय कुलीनों में यदि परस्पर प्रतिस्पर्धा में दावा करना हो कि किसे भारत के जनसमूह के रहन सहन, उनकी आदतें, उनके रहने के तरीके, उनके विचार, उनकी आवश्यकतायें और शिकायतों, उनके विचारों की गहराई से आकलन व शिकायत निवारण, इत्यादि प्रश्नों के बारें में ज्ञान है तो स्थानीय कुलीन का दावा यूरोपियन नौकरशाही से अधिक सशक्त होगा। परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि स्थानीय कुलीनों की जातीय पक्षपात, निश्चित वंषवाद व अपनी गोत्रावली के प्रति झुकाव ऐसी कमियां हैं जो उन्हें भारत के जनसमूह का भाग्य निर्धारक बनने के लिए अयोग्य करार देती हैं। वास्तविकता है कि स्थानीय कुलीनों का जनसमूह से अलगाव इतना है कि इनको जनसमूह की लालसाओं, इच्छाओं व आवश्यकताओं आदि का दायित्व नहीं सौंपा जा सकता क्योंकि वे उनकी उत्कृष्ट लालसाओं के ही शत्रु हैं। मैं यह बात इन कुलीनों के विरुद्ध पूरे दावे से इसलिए कहता हूँ कि स्वशासित भारत जनसमूह के लिए सुरक्षित तभी बनेगा जब भारत में प्रजातंत्र की जड़ें गहरी होने व पनपने दी जाएंगी और कुलीन अमीरों के हाथों में यह बागडोर सुरक्षित नहीं हो सकती क्योंकि हज़ारों वर्षों में बने विचार व संस्कार जो प्रतिदिन के व्यवहार में आज भी वे धारण किये हुए हैं, विशाल जनसमूह के हित में आड़े आएंगे। आधुनिक प्रजातंत्र राज्य का मूल सिद्धान्त इस आस्था पर िंटका है कि हर इकाई मानव के मूल्य की पहचान हो और इस विश्वास पर आधारित है कि