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हर एक का अपना जीवन है व हर एक को अपने जीवन के उत्कृष्ट तक पहुंचने का अवसर प्राप्त हो। भारत में कुलीन अमीरों को इन मान्यताओं में से एक भी मान्यता भारत के जीवन दर्शन के तहत स्वीकार नहीं। इसके विपरीत, वे तो यह विश्वास करते हैं कि वर्तमान जीवन लगातार मिलते रहने वाले जन्मों में से मात्र एक है इस जीवन में प्राप्त पिछले जन्मों के भले बुरे का बकाया है अतः किसी का अच्छे से अच्छा चरित्र, कितना भी महान प्रयास; जन्म द्वारा मिले सामाजिक स्तर को बदल नहीं सकता। अमीरों की यह धारणा कि जो ब्राह्मण पैदा हुआ है ब्राह्मण के अतिरिक्त और कुछ नहीं बन सकता तथा पारिहा का बेटा पारिहा ही रहेगा; परिहा के अतिरक्ति और कुछ नहीं। यह बकवास नहीं है यही जीवन व कर्मण्यता की आस्था है। ऐसे लोगों को असीमित शक्ति देना जल्लाद के हाथ में शस्त्र देने के समान है।
- हममें से जो लोग ऐसा दृष्टिकोण अपनाते है उनको निर्ममता से साम्प्रदायिक और प्रायः देश का शत्रु करार दिया जाता है। कांग्रेसी यह कहते कभी नहीं थकते कि हर देश में शक्ति सदा बुद्धिजीवियों के हाथों में ही रहती है और दक्ष प्रबन्धन के लिए सदैव ऐसा होना चाहिए। जिन के विचार से मिलने वाली राजनीतिक शक्ति कुलीनों के हाथ में होनी चाहिए, संभवतः सामाजिक शक्ति व राजनीतिक शक्ति को मानव आचरण के दो भिन्न पहलू मानते हैं व ऐसे सोचते हैं कि दोनों का एक दूसरे से कोई लेना देना नहीं है। साथियों, आपको ऐसी मौलिकता रहित राय वाली मानव आचरण की परिभाषा में बह जाने से बचने के लिए सजग रहना है। अगर आप इस सार की बात को सदैव अपने जहन में रखेंगे तो आप समझेंगे कि राजनीतिक कार्य ही नही बल्कि किसी भी और कार्य के लिए लोगों की न तो गणना जा सकती है और न ही वे एक दूसरे के आगे, पीछे या ऊपर नीचे किन्हीं अंकों के आधार पर क्रमबद्ध किये जा सकते हैं। एक मनष्य जब वोट मांगने आता है तो उसकी विचारधारा, स्वार्थ व विचार उसके साथ ही बने रहते हैं और वह राजनीति के लिये इनको अपने पुराने कपड़ो की भांति उतार नहीं सकता। वह सब जिससे उसका व्यक्तित्व व जीवन के प्रति दृष्टिकोण बनते हैं उस के वोट के साथ ज्यों के ज्यों बने रहते हैं। कुलीनों की प्रतिभा देश की एक बड़ी सम्पदा है। परन्तु इसके आधार पर देश प्रबन्धन का अधिकार इनको नहीं सौंपा जा सकता। अपने चरित्र व प्रतिभा का कैसा व कितना उपयोग वे कुलीन संभवतः अपना निर्णय करने के लिए करेंगे। हमारे ऊपर उन को