138 22.12.1952 लोकतंत्र को सफलतापूर्वक चलाने के लिए शर्तें - Page 471

450 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के रूप में परिभाषित किया था। इसके अलावा कई और परिभाषाएं गिनाई जा सकती हैं जिनसे यह स्पष्ट हो सके कि लोकतंत्र से लोगों का क्या आशय है।

लोकतंत्र की मेरी परिभाषा है-‘‘सरकार का वह स्वरुप और पद्धति जिससे लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन में बिना रक्तपात किए क्रांतिकारी परिवर्तन लाए जाते हैं’’, यह मेरी परिभाषा है लोकतंत्र की। अगर लोकतंत्र इसको चलाने वाले लोगों को इतना सक्षम बना सके कि वे लोगों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में आधारभूत परिवर्तन ला दें और लोग भी उन परिवर्तनों को बिना रक्तपात का सहारा लिए अंगीकार कर सकें, तो मैं कहूंगा कि यहां लोकतंत्र है। यही असली परीक्षा है। यही शायद सबसे बड़ी परीक्षा है। लेकिन हम जब किसी पदार्थ की गुणवत्ता की जांच कर रहे हों तो उसका कड़े से कड़ा परीक्षण होना चाहिए। तो जहां तक आज के मेरे संबोधन का प्रश्न है, मैं हर हाल में लोकतंत्र को उसी तरह परिभाषित करना चाहता हूं। अब प्रश्न है कि इस तरह का लोकतंत्र सफल कैसे होगा? यही मेरे संबोधन का मुख्य विषय है। किंतु दुर्भाग्य से, लोकतंत्र के इस विषय पर लिखने वाले तमाम लेखकों में से किसी ने भी उन परिपाटियों के बारे में नहीं बताया है जिससे हमें एक ठोस विचार प्राप्त हो सके कि उनके निर्णय के अनुसार लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए कौन-कौन सी आवश्यक पूर्व परिस्थितियां हैं। इसके लिए हमें इतिहास पढ़ना होगा और इतिहास पढ़कर यह पता लागाना होगा कि संसार के विभिन्न हिस्सों में जहां लोकतंत्र रहा है वहां वह सब किस-किस समय असफल हुआ है, और तब हमें अपने निष्कर्ष पर पहुंचना होगा।

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पहली शर्त जो कि मैं समझाता हूं लोकतंत्र के सफल रूप से कार्य करने के लिए आवश्यक शर्त है, यह है कि समाज में भयंकर असमानताएं नहीं होनी चाहिए। उसमें कोई दमित वर्ग नहीं होना चाहिए। वहां ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि एक वर्ग को सारी सुविधाएं प्राप्त हों और एक अन्य वर्ग को सारे का सारा बोझ ही उठाना पड़ता हो। इस प्रकार की चीज, इस तरह का बंटवारा, और समाज का इस तरह का संगठन स्वयं के भीतर ही क्रांति के कीटाणु पालता है, और संभवतः किसी लोकतंत्र के लिए उसका इलाज कर पाना ही संभव नहीं हो सकेगा। गेटिस वर्ग के उसी भाषण में लिंकन ने कहा था, हालांकि लोग उनका मतलब नहीं समझ पाये हैं कि, खुद में ही बंटा हुआ घर कभी खड़ा नहीं रह सकता है।’’ निश्चित रूप से वे दक्षिणी राज्यों और उतरी राज्यों के पारस्परिक विरोध का संदर्भ दे रहे थे। उन्होंने कहा था, ‘‘अगर दक्षिणी राज्यों के आप और उतरी राज्यों के हम बंटे रहे, तो जब कभी कोई विदेशी शत्रु आएगा, हम साथ

खड़े न हो सकेंगे।’’ वह शायद यही अर्थ से संप्रेषित करना चाहते थे जब उन्होंने कहा