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था कि बंटा हुआ घर कभी खड़ा नहीं रर सकता है। लेकिन मैं समझता हूं कि उनके इस वाक्यांश अथवा वाक्य में गहरा अर्थ छिपा है और मैं जो अर्थ समझता हूं वह यह है कि दो वर्गों के बीच जो गहरी खाइयां हैं वे लोकतंत्र की सफलता में सबसे बड़ी बाधाएं साबित होने वाली हैं। क्योंकि आखिर लोकतंत्र में होता क्या है? शर्त-2
यह लोकतंत्र की जरूरत है कि सरकार केवल लोगों के 5 वर्ष के दीर्घकालीन वीटो के ही अधीन न हो, बल्कि एक तात्कालिक वीटो भी होना चाहिए। संसद में तत्पर रुप से ऐसे लोग होने चाहिए, जो सरकार को वहीं की वहीं चुनौती दे सकें। अतः यदि आप समझते हैं कि मैं क्या कर रहा हूं, तो लोकतंत्र का अर्थ है कि किसी को भी सतत रुप से शासन करने का अधिकार नहीं है, बल्कि वह शासन लोगों की अनुमति के अधीन है और उसे सदन में ही चुनौती दी जा सकती है। आप समझ पाएंगे कि ‘विपक्ष’ का होना कितना आवश्यक है। ‘विपक्ष’ का मतलब है कि सरकार हमेशा कटघरे में रहेगी। सरकार को अपने किए गए कार्यों का स्पष्टीकरण उन लोगों को देना ही पड़ेगा जो उसकी अपनी पार्टी के नहीं है। दुर्भाग्य से हमारे देश में सारे अखबार किसी-न-किसी कारण से, और मुझे लगता है विज्ञापनों से उत्पन्न राजस्व के कारण, विपक्ष की तुलना में सरकार को कहीं ज्यादा प्रचारित करते हैं, क्योंकि विपक्ष से केई राजस्व तो मिलता नहीं है। उन्हें सरकार से राजस्व मिलता है और आप पाते हैं कि दैनिक अखबारों में सताधारी दलों के सदस्यों के स्तम्भ दर स्तम्भ छाये रहते हैं और ‘विपक्ष’ द्वारा दिए गये बयान शायद कहीं अंतिम पृष्ठ के किसी अंतिम कोने में रख दिये जाते हैं। लोकतंत्र क्या है मैं इसकी आलोचना नहीं कर रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं कि लोकतंत्र के लिए क्या है। विपक्ष लोकतंत्र के लिए है। पर क्या आपको पता है कि इंग्लैंड में न केवल ‘विपक्ष’ को मान्यता दी गयी है, बल्कि ‘विपक्ष’ के नेता को सरकार ‘विपक्ष’ को चलाने के लिए वेतन का भुगतान करती है।
उसको एक सचिव मिलता है, आशुलिपिकों एवं लेखकों का एक छोटा-सा स्टाफ मिलता है और अपना काम करने के लिए ‘हाउस ऑफ कामन्स’ में एक कमरा दिया जाता है। इसी तरह आप देखेंगे कि कनाडा में विपक्ष के नेता को प्रधानमंत्री की तर्ज पर वेतन दिया जाता है। क्योंकि इन दोनों ही मुल्कों में लोकतंत्र को लगता है कि कोई न कोई होना चाहिए जो सरकार की गलतियों पर उंगली उठा सके। और चूंकि यह लगातार और अनवरत रुप से होना चाहिए, इसलिए वे विपक्ष के नेता पर धन खर्च होने की परवाह नहीं करते हैं।