452 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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मेरा सोचना है कि एक तीसरी शर्त भी है जो लोकतंत्र की सफलता के लिए अनिवार्य कही जा सकती है, और वह है कानून और प्रशासन में समानता। इस उत्तर पर कानून के समक्ष बराबरी को लेकर बहुत खुश होने की आवश्यकता नहीं है, हालांकि जहां-तहां ऐसे मामले हो सकते हैं, जब कानून के समक्ष कोई समानता नहीं है। लेकिन जो चीज जरूरी है वह है प्रशासन में समानता का व्यवहार। बहुत संभव है कि आप में से बहुतों को ऐसे वकये याद आ जाएं जिनमें सताधारी दल केवल अपने सदस्यों के लिए प्रशासन चला रहा हो। कम-से-कम मैं तो इस तरह के बहुतेरे वाकये गिना सकता हूं। मान लीजिए कोई ऐसा कानून है जो कहता है कि बिना लाइसेंस लिए कोई भी किसी वस्तु-विशेष का व्यापार नहीं कर सकता है। तो कोई भी उस कानून से नहीं लड़ सकता, क्योंकि यह सबके लिए बना है। उस नियम-विशेष में कोई भेदभाव नहीं है। लेकिन अब हमें यह देखना चाहिए कि जब कोई व्यक्ति किसी अधिकारी या मंत्री के पास उन वस्तु-विशेष का व्यापार करने के लिए लाइसेंस प्राप्त करने हेतु आवेदन लेकर जाता है तब क्या होता है। मैं नहीं जानता, हो सकता है कि मंत्री पहले उस व्यक्ति की टोपी को देखे। किस रंग की टोपी उसने पहन रखी है? अगर उसने ऐसी टोपी पहन रखी है जो उसे लुभाती है और वहीं एक दूसरा आदमी दूसरी वेशभूषा में या दूसरी पार्टी के संबंध रखने वाला होकर जाता है और निर्णय लेने में लाइसेंस व्यक्ति को दे दिया जाता है तथा दूसरे आदमी को मना कर दिया जाता है। जबकि योग्यता के आधार पर दोनों ही लाइसेंस पाने के लिए पात्र हैं, तो स्पष्ट रूप से यह प्रशासनिक भेदभाव है, और उसमें ईमानदारी नहीं है। बेशक लाइसेंस का मुद्दा अर्थात् छोटी-मोटी सुविधाओं का दिया जाना छोटी बात है और इससे लोगों का एक सीमित वर्ग ही प्रभावित होता है। लेकिन अब हमें यह देखना है कि यदि इसी तरह का पक्षपात प्रशासन में आ जाए तब क्या होगा। मान लीजिए किसी पार्टी विशेष के लिए किसी सदस्य पर किसी अपराध विशेष के लिए अभियोजन किया जा रहा है जिसमें पर्याप्त सबूत हैं, और यह भी मान लीजिए कि उस क्षेत्र विशेष के पार्टी का मुखिया जिलाधिकारी के पास जाता है और उससे कहता है कि उस आदमी पर मुकदमा चलाना उसके लिए ठीक नहीं होगा क्योंकि वह उस पार्टी का सदस्य है और फिर कहता है, ‘‘अच्छा, यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो मैं मंत्री के पास मामला भेजूंगा और आपका स्थानांतरण किसी अन्य स्थान के लिए करवा दूंगा।’’ आप अंदाजा लगा सकते हैं कि तब प्रशासन में कितनी अराजकता और अन्याय भर जाएंगे। यह बिल्कुल उसी तरह की स्थिति है जो संयुक्तराज्य में हुआ करती थी जिसे भ्रष्ट व्यवस्था कहा जाता है। कहने का