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कर ही लिया। और वे खड़े हुए। और जब तीसरी बार वे उनके पास गये तो उन्होंने उन लोगों को रुखाई से रवाना कर दिया। मैं आप लोगों को एक और उदाहरण देता हूं। आप विन्डसर एडवर्ड अष्टम् को जानते हैं जिसकी धारावाहिक कहानी अब टाइम्स ऑफ इण्डिया में प्रकाशित हो चुकी है। मैं गोलमेज सम्मेलन में गया हुआ था और वहां विवाद छिड़ा हुआ था कि क्या राजा को उस औरत से विवाह करने दिया जाना चाहिए जिससे वह चाहता है खासतौर पर तब जबकि वह उसे विवाह करना चाहता है ताकि वह रानी न बन जाए अथवा ब्रिटेन के लोगों को राजा यह व्यक्तिगत अधिकार भी न देना चाहिए और सिंहासन छोड़ने के लिए मजबूर करना चाहिए। मि. वाल्डविन निश्चय ही राजा के विवाह के विरुद्ध थे। वह उनको अनुमति नहीं दे रहे थे, और बोले, ‘‘अगर आप मेरी बात नहीं मानते हैं तो आपको जाना पड़ेगा।’’ हमारे मित्र चर्चिल एडवर्ड अष्टम के मित्र थे और उनको प्रोत्साहित कर रहे थे। उस समय लेबर पार्टी विपक्ष में थी। उनके साथ बहुमत नहीं था और मुझे भली-भांति याद है कि लेबर पार्टी के लोग यह विचार कर रहे थे कि क्या वे इस मुद्दे का लाभ उठाकर मि. बाल्डविन को हरा सकते थे क्योंकि जो अपनी निष्ठा के कारण राजा का समर्थन करना चाहते थे और मुझे याद है कि स्व. प्रोफेसर लास्की ने ‘हेराल्ड’ में शृंखलाबद्ध लेख लिखे थे जिसमें उन्होंने लेबर पार्टी के ऐसे किसी भी पहल की भर्त्सना की थी। उन्होंने कहा था, ‘‘हमारी रीति के अनुसार हम सदैव इस बात से सहमत रहे हैं कि राजा को प्रधानमंत्री की सलाह स्वीकार करनी ही पड़ेगी और अगर वे नहीं करते हैं तो प्रधानमंत्री को जबरन उन्हें बाहर निकालना पड़ेगा।’’ हमारी ऐसी नीति के होते हुए यह हमारी गलती होगी यदि हम मि. बाल्डविन को एक ऐसे मुद्दे के कारण हराते हैं जिसमें राजा के प्राधिकार में वृद्धि होती है। और लेबर पार्टी ने उनकी सलाह मान ली और ऐसा कुछ भी नहीं किया। वे बोले कि उन्हें खेल के नियमों का पालन करना ही चाहिए। अगर आप अंग्रेजों का इतिहास पढ़ें तो आपको ऐसे कई दृष्टांत मिल जाएंगे जिनमें पार्टी के नेताओं को बहुत-से प्रलोभन के अवसर थे जिनमें वे सरकार में या विपक्ष में बैठे अपने विरोधियों को हानि पहुंचा सकते थे, किसी ऐसे मुद्दे को पकड़कर, जिससे उन्हें अल्पकालिक शक्ति मिल रही थी, लेकिन जिनका शिकार बनने से उन्होंने मना कर दिया, क्योंकि वे जानते थे कि इससे वे संविधान और लोकतंत्र दोनों को क्षति पहुंचा देंगे।

एक और चीज है जो मैं सोचता हूं कि लोकतंत्र के चलने के लिए बहुत जरूरी है और वह ये है कि लोकतंत्र के नाम पर बहुमत द्वारा अल्पमत पर अत्याचार नहीं होना चाहिए। अल्पमत को हमेशा सुरक्षित रहने का बोध होना चाहिए, कि भले ही बहुमत सरकार चला रही है, अल्पमत को चोट नहीं पहुंच रही है या उनके विरुद्ध गलत हथकंडों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। हाउस ऑफ कामन्स में इस