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456 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बात का अत्यधिक सम्मान किया जाता है। आप लोगों में से बहुतों को सन् 1931 में इंग्लैंड में हुए चुनावों की याद अभी भी होगी जब मि. रैमसे मैंक डोनल्ड ने लेबर पार्टी छोड़कर राष्ट्रीय सरकार बना ली थी। जब चुनाव आये तो लेबर पार्टी, और मैं समझता हूं जिसकी सं. लगभग 150 के आसपास थी, के पास 650 में से केवल 50 सदस्य थे जिसमें प्रधानमंत्री मि. बाल्डविन भी शामिल थे। तब मैं वही पर था। पर मैंने एक भी ऐसा वाकया नहीं सुना जिसमें लेबर पार्टी के 50 सदस्यों वाली इस अल्पमत पार्टी ने कंजरवेटिवस् की विशाल बहुमत वाली पार्टी के अधीन कार्य करते हुए कभी यह शिकायत की हो उन्हें अभिव्यक्ति या विरोध के अधिकार से अथवा किसी प्रकार के प्रस्ताव पारित करने के अधिकार से वंचित किया गया जैसा कि आप शायद जानते हैं। आप हमारे संसद को ले लीजिए। बार-बार निन्दा प्रस्ताव या स्थगन प्रस्ताव लाकर विपक्ष के सदस्य जो कर रहे हैं मैं उसको जायज नहीं ठहरा रहा हूँ। यह बहुत अच्छा नहीं लगता कि संसद में लगातार इन स्थगन प्रस्तावों का इस्तेमाल करते हुए कार्य किया जाए। लेकिन फिर आपने ध्यान दिया होगा कि शायद ही होई स्थगन या निन्दा प्रस्ताव बहस के लिए शामिल किया गया हो। मुझे इस पर बहुत आश्चर्य होता है। जितना मैंने अंग्रेजी संसद की बहसों को पढ़ा है उसमें शायद ही मुझे कोई ऐसा मुद्दा मिला है जिसमें स्पीकर ने स्थगन की मांग को नकार दिया हो, बशर्तें यह सरकार का आदेश हो। जब मैं बॉम्बे लेजिस्लेटिव एसेंबली का सदस्य था तो सरकार में हमारे कुछ मित्र मि. मोरार जी, मि. मुंशी तथा मि. खेर व कुछ अन्य थे। वे किसी एक स्थगन प्रस्ताव को भी बहस की अनुमति नहीं देते थे। या तो तत्कालीन स्पीकर हमारे मित्र श्री मावलंकर इसको मना करते हुए उनकी सहायता करते थे या फिर अगर वे इसको शामिल भी करते थे तो मंत्रीगण इसका विरोध कर देते थे। आपको मालूम है कि जब कोई मंत्री विरोध करता है तो स्थगन प्रस्ताव लाने वाले व्यक्ति को निर्धारित कोटे के अनुसार 30 या 40 लोगों को प्रस्तुत करना पड़ता है। यदि सरकार उन छोटे समुदायों के स्थगन प्रस्तावों का, जिनका सदन में प्रतिनिधित्व 4, 5 या 6 सदस्य ही करते हैं, विरोध लगातार ही करते रहे तो ऐसा हो सकता है कि ऐसे छोटे समुदायों को अपनी शिकायतें अभिव्यक्त करने का कभी अवसर ही न मिल सके। तो क्या होता है कि अल्पमत लोगों का संसद के लोगों के मन में लोगों के प्रति घृणा पैदा हो जाती है और उनके मन में कुछ गर-संवैधानिक क्रांतिकारी भाव विकसित हो जाते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि जब लोकतंत्र चल रहा हो तो बहुमत को, जिस पर यह आधारित है, अन्यायपूर्ण तरीके से बर्ताव नहीं करना चाहिए।

एक और मुद्दा है जिसका सन्दर्भ देकर मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। मुझे लगता है कि समाज में नैतिक व्यवस्था का कार्य करते रहना लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है। पता नहीं क्यों हमारे राजनीति-विज्ञानियों ने लोकतंत्र के इस पहलू पर