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कभी विचार नहीं किया है। आचरण-शास्त्र कुछ ऐसी चीज है जो राजनीति से पृथक है। आप भले ही आचरण-शास्त्र के बारे में कुछ न जानते हों आप राजनीति सीख सकते हैं मानों आचरण के बिना रानीति चल सकती है। मेरे हिसाब से यह अवधारणा अत्यंत भ्रामक है। लोकतंत्र में आखिर होता क्या है? लोकतंत्र के बारे में कहा जाता है कि वह मुक्त सरकार है। और मुक्त सरकार से हमारा क्या आशय है? मुक्त सरकार का मतलब है सामाजिक जीवन के व्यापक पहलुओं में लोग कानून के हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र होकर जीने के लिए छोड़ दिए जाते हैं, और अगर कानून बनना जरूरी ही होता तो कानून बनाने वाला यह अपेक्षा करता है कि उस कानून को सफल बनाने के लिए समाज के पास पर्याप्त नैतिकता रहेगी। मुझे लगता है कि एकमात्र लास्की ही ऐसा व्यक्ति है जिसने लोकतंत्र के इस पक्ष की बात की है। उन्होंने अपनी एक कृति में अपनी बात में बहुत साफ ढंग से कहा है कि लोकतंत्र में नैतिक व्यवस्था का अस्तित्व सहज ही मान लिया जाता है। अगर नैतिक व्यवस्था बिल्कुल न रहे तो लोकतंत्र की धज्जियां उड़ जाएंगी, जैसा कि शायद हमारे देश में हो रहा है।
अंतिम चीज जिसका सन्दर्भ मैं दे रहा हूं वह यह है कि लोकतंत्र के लिए ‘जन चेतना’ जरूरी है। इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि यद्यपि प्रत्येक देश में अन्याय मौजूद है, अन्याय का प्रसार समान नहीं है। कुछ देश हैं जहां अन्याय का प्रभाव बहुत कम है। कुछ ऐसे भी हैं जिन पर अन्याय का प्रभाव बहुत अधिक है। और कुछ ऐसे भी हैं जो अन्याय के बोझ तले पूरी तरह से कुचल दिये गये हैं। आप बड़ी आसानी से इंग्लैंड के यहूदियों के मामले को उद्वरित कर सकते हैं। इन लोगों ने कुछ ऐसे अन्याय भोगे हैं जो ईसाईयों ने कभी नहीं भोगे। हुआ यह कि इस अन्याय का उन्मूलन करने के लिए यहूदियों को अकेले ही लड़ना पड़ा। लेकिन अंग्रेजी ईसाईयों ने कभी उनकी सहायता नहीं की। वास्तव में यह उन्हें अच्छा लग रहा था। केवल राजा ही इंग्लैंड का एकमात्र व्यक्ति था, जिसने यहूदियों की सहायता की। यह विचित्र हो सकता है। लेकिन इसका कारण भी विचित्र है और कारण यह है कि पुराने ईसाई नियमों के अनुसार यहूदियों के बच्चे अपने पिता की सम्पत्ति को विरासत में नहीं पा सकते थे। सिर्फ इसलिए कि वह ईसाई न होकर यहूदी थे। और चूंकि राजा राज्य की बची हुई सम्पत्तियों का वारिस था इसलिए मरे हुए यहूदी की सम्पत्ति उसको मिल जाती थी। राजा को यह चीज अच्छी लगती थी। वह बहुत प्रसन्न था। जब यहूदियों के बच्चे दरख्वास्त लेकर राजा के पास पहुंचे तो राजा ने उन्हें उनके मृतक पिता की सम्पत्ति का थोड़ा-सा हिस्सा देकर बाकी उसने अपने पास रख लिया। पर जैसा मैंने बताया किसी ईसाई ने यहूदियों की मदद नहीं की और यहूदी अपनी मुक्ति के लिए लड़ते रहे। यह उसी का परिणाम था जिसे ‘जन चेतना’ कहा जाता है। जन चेतना का अर्थ है वह चेतना जो किसी भी अन्याय को देखकर उद्वेलित हो जाती हो चाहे उसका भुक्तभोगी