138 22.12.1952 लोकतंत्र को सफलतापूर्वक चलाने के लिए शर्तें - Page 479

458 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कोई भी हो और इसका मतलब है कि हर कोई चाहे वह उस अन्याय को स्वयं भोग रहा हो अथवा नहीं, भोगने वाले को उससे मुक्त करने के लिए उसके साथ खड़ा हो जाए। आप दक्षिण अफ्रीका को ले लें जो सबसे ताजा उदाहरण है। वहां अन्याय भोगने वाले लोग भारतीय हैं। हैं कि नहीं? श्वेत लोग नहीं भोग रहे हैं फिर भी आप देख रहे हैं कि सम्मानित स्कॉट स्वयं श्वेत होकर भी इस अन्याय को समाप्त करने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं। अभी मैंने पढ़ा है कि श्वेत प्रजाति के युवा लड़के-लड़कियों का एक विशाल समूह दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों के संघर्ष में शामिल हो गया है। इसी को ‘जन चेतना’ कहते हैं। मैं आप लोगों को चौंकाना नहीं चाहता। लेकिन कभी-कभी लगता है कि हमारी स्मृति कितनी कमजोर है। हम दक्षिण अफ्रीका की बात कर रहे हैं। मैं मन ही मन आश्चर्य कर रहा हूं कि हम जो भेदभाव और न जाने किन-किन मुद्दों पर बात कर रहे हैं, क्या हमारे सभी गांवों में एक दक्षिण अफ्रीका नहीं हैं। हां, हां हैं हमें बस जाकर देखना है। गांवों में हर जगह दक्षिण अफ्रीका है फिर भी मुझ बड़ी मुश्किल से कोई ऐसा मिला है जो अनुसूचित वर्ग का न होकर भी उनके मकसद के लिए लड़ रहा हो, और क्यों? क्योंकि वहां ‘जन चेतना’ है ही नहीं। मैं और मेरा भारत केवल इन्हीं शब्दों में मैं बंधकर रह गया हूं। अगर ऐसा ही होता है तो अल्पसंख्यक वर्ग अन्याय को झेल रहा है। उसे इस अन्याय से मुक्ति दिलाने के लिए दूसरों से कोई सहायता नहीं मिलेगी। इससे भी क्रांतिकारी सोच का निर्माण होता है जिससे लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। अब, जैसा कि मैंने बताया, जो भी मैं कह रहा हूं वह राजनीति-विज्ञानियों द्वारा विकसित किया हुआ विश्वासों के नाम भर नहीं है बल्कि विभिन्न देशों के राजनीतिक इतिहासों का अध्ययन करने के बाद मेरे मस्तिष्क पर जो छाप पड़ी है उसी का परिणाम है, और मेरा मानना है कि लोकतंत्र को बचाये रखने के लिए ये सबसे जरूरी शर्तें हैं।

देवियो और सज्जनो मुझे कोई इल्म नहीं है कि मुझे निमंत्रण देने के पीछे आपका निहित उद्देश्य या मकसद क्या था। हो सकता है कि आप अपने कार्यक्रम में कुछ जोड़ना चाहते थे। मैं आशा करता हूं कि मैंने वह काम कर दिया है। पर जहां तक मेरा प्रश्न है तो मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि मेरे हिसाब से मैंने आज की शाम जिस विषय पर बोला है वह इस राष्ट्र के लिए बड़े ही महत्व का विषय है। किसी तरह से हमारे मन में यह विचार बैठ गया है कि हमें आजादी मिल गयी है। अंग्रेज चले गये हैं। हमें एक संविधान मिल गया है जिसमें लोकतंत्र का प्रावधान किया गया है। तो भला हमें अब और क्या चाहिए? ऐसा कहकर बिना कुछ किये-धरे अब हम और नहीं बैठे रह सकते हैं। इस प्रकार के विचार से मैं आपको सावधान करना चाहता हूं कि संविधान बनने के साथ ही हमारा काम खत्म हो गया है। यह अभी खत्म नहीं हुआ है। यह केवल शुरू भर हुआ है। याद रखिये