466 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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यूरोपीय संघर्ष का इतिहास एशिया में दुहराया जाएगा
फेडरेशन के महासचिव तथा विश्व बौद्ध सम्मेलन के प्रतिनिधि श्री पी.एन.
राजभोज ने 15 फरवरी 1953 को नई दिल्ली में एक स्वागत भोज का आयोजन
किया था। यह आयोजन ‘इन्डो-जापानी कल्चरल एसोसिएशन’ जापान के उपाध्यक्ष
श्री एम.आर. मूर्ति के सम्मान में किया गया था जिसमें विचार व्यक्त करते हुए डॉ.
अम्बेडकर ने कहा कि वर्तमान या भावी पीढ़ी में से किसी न किसी को बुद्ध या
मार्क्स में से किसी एक के सिद्धांतों का वरण करना पड़ेगा।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि, ‘‘विश्व की जो मौजूदा स्थिति है, उसका जहां
तक मैं अध्ययन कर पाया हूं उसके आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि
संघर्ष का स्वरूप चाहे कुछ भी हो किंतु यह अंततः बुद्ध और मार्क्स के विचारों के
बीच होगा।’’
‘उन्होंने कहा कि, इसी अधिवेशन से मैं जापान, चीन व अन्य पूर्वी देशों की
ओर आकृष्ट हुआ हूं।’ डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि पूरब, पश्चिम से पहले से ही अधिक
महत्वपूर्ण बन गया है, लेकिन मुझे संदेह है कि यदि बुद्ध के उपदेशों को आत्मसात
नहीं किया गया तो, एशिया में यूरोप के संघर्ष का इतिहास दुहराया जाएगा। बौद्ध
धर्म के अलावा जो धर्म है उन्होंने आत्माओं, कर्मकांडों की समस्याओं पर केंद्रित होकर
मनुष्य को भुला दिया है। डॉ. अम्बेडकर ने बताया कि केवल बुद्ध ही ऐसे थे जिनसे
आत्मा के बारे में बार-बार पूछने पर वे कहते थे, ‘‘ये सारे तर्क बेकार हैं। आत्माओं
का अस्तित्व कोई भी सिद्ध नहीं कर सकता है। मेरा ध्यान सिर्फ मनुष्यों पर केंद्रित
है। मैं मनुष्यों के बीच नैतिक सद्व्यवहार को प्रतिष्ठित करना चाहता हूं।’’ ख्1,
1 खैर मोडे, वाल्यूम 2, पृष्ठ 63-66