476 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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‘प्रत्येक व्यक्ति का एक जीवन दर्शन होना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य का एक ऐसा स्तर होना चाहिए जिससे वह अपने चरित्र को माप सके। और दर्शन मापने के पैमाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
नकारात्मक रूप से, मैं भगवद्गीता में दिये गये हिंदू जीवन दर्शन को खारिज करता हूं, क्योंकि यह सांख्य दर्शन के त्रिगुण पर आधारित है जो कि मेरे हिसाब से कपिल के दर्शन का विभक्त विरूपण है और जिसने जाति व्यवस्था और श्रेणीगत असमानता को हिंदू सामाजिक जीवन का नियम बना दिया है। सकारात्मक रूप से, आप कह सकते हैं कि मेरा जीवन दर्शन तीन शब्दों में निहित है स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व। हालांकि आप यह मत कहिए कि मैंने अपना दर्शन फ्रांस की क्रांति से उधार लिया है। ऐसा नहीं है। मेरे दर्शन की जड़ें धर्म में है न कि राजनीति विज्ञान में। मैंने उन्हें अपने मार्गदृश्य बुद्ध से ग्रहण किया है। उनके दर्शन में स्वतंत्रता और समानता को जगह दी गयी है लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि असीमित स्वतंत्रता समानता को नष्ट कर देती है, और संपूर्ण समानता में स्वतंत्रता के लिए जगह नहीं बचती है। उनके दर्शन में कानून को जगह केवल स्वतंत्रता और समानता में विघटन से सुरक्षा देने के लिए दी गयी है लेकिन उनका यह मानना नहीं था कि कानून स्वतंत्रता और समानता में विघटन की गारंटी बन सकता है। स्वतंत्रता, समानता या बंधुत्व की मनाही के एकमात्र सुरक्षा उपाय के रूप में बंधुत्व को उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है जो कि भाईचारे या मानवतावाद का ही एक पर्याय है, और ये धर्म के पर्याय है। कानून धर्म-निरपेक्ष है जिसको कोई भी तोड़ सकता है जबकि बंधुत्व या धर्म पवित्र होता है जिसका सम्मान करना सबके लिए आवश्यक है। मेरे दर्शन का एक उद्देश्य है। मुझे धर्मान्तरण का कार्य करना है। क्योंकि मुझे त्रिगुण सिद्धांत के अनुयायियों से इसको छुड़वाकर अपने दर्शन स्वीकार करवाना है। आज भारतीय दो विचारधाराआें स नियंत्रित हो रहे हैं। संविधान को प्रस्तावना में उद्धृत उनका राजनीतिक आदर्श एक ऐसे जीवन की पुष्टि करता है जिसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व है। उनके धर्म में स्थापित उनका सामाजिक आदर्श इनको निषिद्ध करता है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर
(दिनांक 03 अक्तूबर, 1954 को भाषण का आकाशवाणी पर प्रसारण)