5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 50

29

भी काबिज़ व्यक्ति किसी बेदखल व्यक्ति के भले के लिए अपनी इच्छा से कब्जे़ के अधिकार का त्याग नहीं करता। इसलिए, यह भ्रम न पालें कि अगर एक बार शक्ति उनके हाथों मे आ गई तो सामाजिक समस्या का समाधान समझौते से कर लेंगे क्योंकि समझौते से उनकी शक्ति का नुकसान होता है। वे एक नये आन्दोलन से पदच्युत हुए बगैर यह बात समझौते से मानने वाले नहीं। मित्रों, मैं आपको यह परामर्श एक दार्शनिक एडमण्ड बर्क के कथनानुसार, ‘‘अपनी सुरक्षा व्यवस्था में अधिक आस्था रखकर नाश कराने से अच्छा है कि हम शंकालु कहला कर अपमानित होना झेल लें’’ दे रहा हूँ। इस परामर्श पर चलते हुए मेरा मानना है कि हमे सामाजिक समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक तंत्र द्वारा पूर्ण संरक्षण की शर्त पर अडिग रहना है और इस समस्या को उनके भरोसे न छोड़ें जो निरंकुश नियंत्रण के लिए चालें चल रहे हैं।

Col1 Col2 Col3
n f
Col1 Col2
Col1 Col2
s
lqj {k
mi k;

दलित वर्ग के लिए सुरक्षा उपायः

  1. यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हमारे विचार में ये सामाजिक मुद्दे भारत में स्वशासन के आडे़ नहीं आएंगे परन्तु स्वशासित भारत के संविधान में नियंत्रण और संतुलन की शक्ति के प्रावधान की, अल्पसंख्यकों व कमजोर समुदायों को उत्पीड़न से बचाने की आवश्यकता हेतु अनदेखा नहीं कर सकते। दलित वर्ग के हितों का संरक्षण एक अच्छे ढंग से कैसे सुनिश्चित करें यह मेरा अगला प्रश्न है जिस पर चिन्तन प्रस्तुत है। कुछ वे लोग जिन्होंने भारतीय राजनीतिक समस्या का अध्ययन किया है इस बात से सहमत हैं कि इस समस्या का कोई समाधान अवश्य होना चाहिए और वह समाधान स्वशासित भारत के संविधान का अंग होना चाहिए। इन अध्ययनकर्ताओं ने समस्या का हल सुझाने में अधिकांश उन देशों को, जिन्हें स्वतंत्रता विश्वयुद्ध के पश्चात मिली थी और जिनका उल्लेख मैंनें पहले अपने भाषण में किया है के संविधानों की तर्ज पर किया है और यह अति स्वाभाविक क्रिया है। क्योंकि ये ही वे राज्य हैं जहां भारत जैसी ही स्थितियां हैं। इन राज्यों ने संविधान में अल्पसंख्यकों के मूलभूत अधिकारों को अधिनियमित कर उनके संरक्षण के प्रावधान बनाकर उनके हितों की रक्षा की। नेहरू समिति ने भी दलितों के संरक्षण के लिए इसी विधि को उत्तम करार दिया है व अंगीकृत किया है। मैं आपको चेतावनी देना चाहता हूंँ कि कहीं, आप बहकावे में न आ जाएं। भारतीय नेताओं को संविधान में अधिनियमित विधि (LAW) में बहुत विश्वास लगता है जिसे वे मानव अधिकार कहते हैं व इनके अन्तर्गत