5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 51

30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अल्पसंख्यकों को देने के लिए उसी प्रकार बहुत उत्सुक हैं जैसे वे दफ्तरी बाबुओं द्वारा उनके ही समूह के अधिकारों के हनन के विरुद्ध प्रावधान के पक्ष में थे। परन्तु हमें केवल ऐसे संरक्षण के प्रावधानों भर से संतुष्ट नहीं होना है। ऐसा नहीं कि हम इन घोषणाओं का स्वागत नहीं करते परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी प्रावधान जिसकी शर्त व आशय कितने भी विस्तार से संविधान में क्यों न लिखें हों, अपने आप में इन विशेष अधिकारों का लाभ नहीं दिला सकते। इस अधिकार के लाभ की गांरटी उस घोषणा में नहीं बल्कि उस अधिकार के हनन होने पर उसके उपचार के लिए बनाए प्रावधान में है जिससे अधिकार प्राप्ति के लिए बाधित किया जा सके। युद्ध के बाद स्वतंत्र घोषित राज्य, जिनका मैंनं पहले उल्लेख किया है, के संविधानों में इतना प्रावधान तो है कि यदि अल्पसंख्यकों को लगे कि उनके मानव अधिकारों का बहुमत समुदाय ने उल्लंघन और हनन किया है तो वे राष्ट्र संघ के समक्ष पुनर्विचार की प्रार्थना कर सकते हैं और राष्ट्रसंघ की एक समिति इसी आशय की शिकायतें लेने व उन पर पंचायती निर्णय देने में सक्षम हैं। क्या नेहरू समिति रिर्पोट में मानव अधिकारों के उल्लंघन व हनन की स्थिति में उपचार का प्रावधान है? मुझे इसमें कोई ऐसी अपील की धारा नहीं दिखी। इसलिए, नेहरू संविधान में यह गांरटी मात्र एक भ्रम है।

  1. अगर नेहरू संविधान में अपील का उपबंध होता तो भी मैं आप लोगों को इस व्यवस्था को स्वीकारने का परार्मश नहीं देता। राष्ट्रसंघ या वाइसराय या सरकार को अपील याचिका लगाने का अधिकार दलित वर्गों के लिए आयुधशाला में एक अच्छा वांछित अतिरिक्त अस्त्र साबित होता। परन्तु यह एक प्रभावशाली अस्त्र नहीं हो सकता। अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सबसे प्रभावशाली उपाय तो नियंत्रण की शक्ति स्वयं के हाथों में होने से ही है, ताकि जब कोई तुम्हारे अधिकारों के विरुद्ध साजिश करे तो स्वयं केवल उसे दण्ड ही न दे पाओ बल्कि ध्यान भी रख पाओ जिससे कोई साजिश ही न कर पाये। किसी भी तीसरा अर्थात राज्यपाल या वाइसराय या राष्ट्र संघ के हाथों में नियंत्रण शक्ति छोड़ देने से यह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसी शक्ति हमारे किस काम की कि जब हम उस शक्तिपुंज से किसी आवश्यकता के समय हस्तक्षेप की याचना करें और वह शक्ति नियंत्रक शक्ति उपयोग से इन्कार कर दे। अपने हितों की रक्षा के बचाव के लिए सब से उपयुक्त उपाय तो स्वषासित भारत में कार्यकारी नियंत्रण हमारे अपने हाथों में होना है और यह तभी संभव है जब देश की विधायिकाओं में हमारा पर्याप्त प्रतिनिधित्व