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भारत में बौद्ध आन्दोलन एक रूपरेखा
बुद्ध को वीजा या पासपोर्ट की जरूरत नहीं है
4 दिसंबर, 1954 को रंगून (बर्मा) में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन का आयोजन हुआ। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने सम्मेलन में भाषण दिया। उन्होंने अपनी वार्ता का वृहद संस्करण दो भागों वाले ज्ञापन के रूप में तैयार किया था : ज्ञापन के भाग 1 में भारत में बुद्ध धर्म के प्रचार का कार्यक्रम दिया गया है। ज्ञापन 1 में जो बिंदु डॉ. अम्बेडकर ने उठाये थे, उनमें से दो बिंदुओं को उन्होंने स्वयं पूरा कर लिया था :-
(1) ‘‘बुद्ध और उनका धर्म’’ शीर्षक के अंतर्गत बुद्ध के उपदेशों को प्रकाशित
करवाकर; तथा
(2) बौद्ध धर्म में धर्मांतरण के लिए एक कार्यक्रम की प्रस्तावना करके।
भाग-2 में दक्षिण भारत में भारतीय बौद्धों की स्थिति के बारे में वर्णन किया गया है - संपादक।
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बर्मा के बुद्धिस्ट शासन काउंसिल से मेरी वार्ता का रिकार्ड वृहद् संस्करण
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(1) यदि शासन काउंसिल के लक्ष्यों में एक लक्ष्य बुद्ध धर्म का बर्मा से बाहर
फैलाने का है तो भारत पहला देश है जहां उनको अपना मुख्य प्रयास करना
चहिए। इस संबंध में भारत से अधिक परिणामदायक देश कोई दूसरा नहीं
होगा।
(2) कारण स्पष्ट है। भारत बुद्ध धर्म की जन्म स्थली है। 543 ई. पूर्व से 1400
ई. तक करीब 2000 वर्षों तक यह भारत में फला-फूला यद्यपि बुद्ध धर्म वहां
से लुप्त हो गया है, वहां अभी भी बुद्ध का नाम बड़े आदर से लिया जाता
है और उनके धर्म की स्मृतियां अभी तक ताजी हैं। भारत में बौद्ध धर्म एक
सूखा पौधा जरूर है लेकिन यह कोई नहीं कह सकता है कि इसकी जड़ें