152. 4.12.1954 भारत में बौद्ध आन्दोलन एक रूपरेखा - Page 501

480 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मर चुकी हैं। हिंदू उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं। भारत में हमें किसी

नये पैगम्बर को इस तरह प्रतिष्ठा नहीं दिलानी है जिस प्रकार यहूदियों के

बीच अपने देवताओं को प्रतिष्ठा वापस दिलाने के लिए नेबुर्चनेरर को करना

पड़ा था। हमें सिर्फ उनके (बुद्ध के) धर्म को वापस ले आना है। फलदायी

प्रयासों के लिए इतनी सरल स्थितियां किसी अन्य देश में नहीं मिल सकतीं।

वहां के समाज में बहुत पहले से स्थापित और अच्छी स्थिति वाले धर्म है

और बौद्ध धर्म को बिना पासपोर्ट का घुसपैठिया नहीं समझा जाएगा। जहां

तक भारत की बात है, बुद्ध को न तो पासपोर्ट की आवश्यकता है और न

ही वीजा की।

(1) हिंदुओं में एक ऐसा वर्ग है जो हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म में जाने के लिए उत्सुक है। इन वर्गों में अछूत और पिछड़ी जातियां हैं। वे हिंदू धर्म की श्रेणीगत असामानता के सिद्धांत के कारण इसके विरोधी हैं। अपने बौद्धिक जागरण की वर्तमान स्थिति में वे हिंदू धर्म के विरुद्ध कमर कर कर खड़े हो गये हैं। उनके असंतोष का फायदा उठाने का यही सबसे उचित समय है।

उनके लिए ईसायत की तुलना में बौद्ध धर्म चुनने के निम्नलिखित तीन आधार हैं :

( i ) बुद्ध धर्म भारत के लिए कोई विदेशी धर्म नहीं है।

( ii ) बुद्ध धर्म का मूल उपदेश सामाजिक समानता है और वे इसी की तलाश

में हैं।

( iii ) बुद्ध धर्म एक तर्कसंगत धर्म है जिसमें अंधविश्वास की कोई जगह नहीं

है।

(4) इस आधार पर बुद्ध धर्म में शुरुआती चरणों में आने वाले अधिकांश लोग निचले तबके से होंगे, अभियान शुरू करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। शासन काउंसिल को वे गलतियां नहीं दुहरानी चाहिए जो भारत में ईसाई मिशनरियों ने किया था। ईसाई धर्म प्रचारकों ने ब्राहा्रणों को धर्मान्तरण कराने के प्रयास से शुरुआत की। उनकी रणनीति यह थी कि यदि पहले ब्राहा्रणों का धर्मान्तरण करा लिया गया, तो बाकी हिंदुओं के धर्मान्तरण में कठिनाई नहीं होगी। उनका तर्क था कि यदि पहले ब्राहा्रणों का धर्मान्तरण कर लिया गया तो गैर-ब्राहा्रणों के पास जाकर कह सकेंगे कि, ‘‘अब ब्राहा्रणों ने ईसाइयत कबूल कर लिया है तो आप लोग क्यों नहीं करते। वे तो आपके धर्म के अगुआ हैं।’’ ईसाइयों की यह रणनीति कुछ ईसाई धर्म प्रचारकों के लिए घातक साबित हुई। वे भला क्यों करने वाले हैं धर्मान्तरण? हिंदू