482 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किया जाना चाहिए। बुद्ध के उपदेशों की पुस्तिका बनाते समय बुद्ध की
सामाजिक और नैतिक शिक्षाओं पर जोर दिया जाए, इस बात का ध्यान
रखा जाना चाहिए। मैं इस पर जोर देकर कह रहा हूं क्योंकि अभी तक
केवल ध्यान, चिंतन और अभिधम्मों पर ही बल दिया जाता रहा है। बुद्ध
धर्म को यदि इसी तरीके से भारतीयों के बीच लाया गया तो हमारे मकसद
के लिए घातक होगा।
( ii ) आम जनता के लिए ईसाइयत में बपतिस्मा जैसा धार्मिक संस्कार रखा गया
है। वास्तव में धर्मान्तरण अर्थात् बुद्ध का एक साधारण शिष्य बनने के लिए
किसी तरह का धार्मिक संस्कार मौजूद ही नहीं है। धर्मान्तरण के संबंध में
जो कुछ संस्कार है वह भिक्षु बनने और संघ में चले जाने तक सीमित है।
ईसाईयों में दो धार्मिक संस्कार होते हैं।
(1) ईसाइयत स्वीकार करने के लिए बपतिस्मा
(2) पुजारी बनने के लिए बुद्ध धर्म में बपतिस्मा की तर्ज पर कोई संसकर नहीं
है। यही मुख्य कारण है कि एक बार बुद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद भी
लोग इसे छोड़कर चले जाते हैं। हम जो धार्मिक संस्कार लाये वह ईसाई
बपतिस्मा की तरह नहीं होना चाहिए कि जिसे बौद्ध कहलाने के लिए हर
आम आदमी को यह अनुभूति करवाना पड़े। केवल पंचशील का उच्चारण
कर लेना भर काफी नहीं है। किसी आदमी को यह अनुभूति कराने के लिए
कि वह अब हिंदू नहीं रहा और एक नया मनुष्य बन रहा है, कई अन्य चीजें
भी शामिल की जानी चाहिए।
( iii ) कई सारे साधारण उपदेशकों की नियुक्ति करना जो जा-जाकर बौद्ध लोगों
के बीच उपदेश दे सकें और यह देख सकें कि वे बुद्ध धम्म का कितना
पालन कर रहे हैं। इन साधारण उपदेशकों को वेतन जरूर दिया जाए और
दूसरी बात वे विवाहित होने चाहिए। आरंभ में वे अंशकालिक कार्यकर्ता भी
हो सकते हैं।
( iv ) एक बौद्ध धार्मिक केंद्र की स्थापना करना जहां उपदेशक बनने के इच्छुक
व्यक्तियों को बुद्ध धर्म की तथा अन्य धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन की शिक्षा
दी जा सके।
( v ) प्रत्येक रविवार को बुद्ध विहार में सामूहिक पूजा का प्रावधान करना जिसके
बाद उपदेशों का एक सत्र हो।
(7) हमारे प्रचार-प्रसार अभियान की सहायता के लिए इन शुरुआती पहलों के
अतिरिक्त भी कुछ आवश्यक चीजें हैं जिन्हें व्यापक पैमाने पर किये जाने