5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 52

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हो। केवल इसके द्वारा ही, हम दिन-प्रतिदिन की कार्यकारी कारगुजारी पर सतर्क निगरानी रख सकते हैं तथा इस माध्यम से हम अपना संरक्षण भी कर सकते हैं और प्रगति भी। अगर तुम्हें इसके अतिरिक्त और अधिक रक्षोपाय तथा गांरटी मिल सकता है तो हिचक किस बात की। इससे तुम्हारे धनुष की अतिरिक्त डोरियां वाली स्थिति होगी। परन्तु पर्याप्त प्रतिनिधित्व की मांग को छोड़ने पर तुम्हें और कुछ भी मिलता हो तो उसे स्वीकारना नहीं। अगर आप किसी भी प्रकार के देश के राजनीतिक गठन को स्वीकार करने से इन्कार करते हो जिसमें आपको पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता, तो आप अपने अधिकार क्षेत्र में ही होंगे।

  1. उपयुक्त प्रतिनिधित्व पद हर अल्पसंख्यक की जुबान पर है परन्तु मात्रात्मक परिभाषा के अभाव में इसका अर्थ अस्पष्ट रह जाता है और यह झगड़ालू चर्चा का विषय बन जाता है। यदि हम अपनी इस मांग को एक प्रत्यक्ष स्वरूप देना चाहते हैं तो इस पद को एक मात्रात्मक परिभाषा देना अत्यावश्यक है। कांग्रेसियों में एक विचारधारा बहुत प्रचलित हो रही है जिसके अनुसार उपयुक्त प्रतिनिधित्व का अर्थ जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व है। मेरे विचार से अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के लिए ऐसा गणित सूत्र एक भद्दा व भोंडा मजाक है तथा बहुसंख्यक समुदाय का अनिच्छा से अल्पसंख्यकों को कुछ भी न देने की भावना उजागर करती है। अल्पसंख्यकों की शक्ति तो उनके प्रतिनिधियों से प्राप्त शक्ति तथा उनके अपने सामाजिक स्तर शक्ति पर आधारित हैं और उनको यह लगता है कि इतनी शक्ति उनके लिए कम है, इसलिए वे इसमें बढ़त चाहते हैं। इस शक्ति में बिना किसी बढ़त के उनको लगता है कि बहुमत समुदाय जो पहले ही शक्तिशाली है तथा और राजनीतिक शक्ति हाथ में आने के बाद अल्पसंख्यक उनसे मुकाबला नहीं कर पाएंगे। इस तर्क के आधार पर अल्पसंख्यकों का बचाव उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देकर ही हो सकता है। अगर यह सत्य है तो प्रश्न उठता है कि जनसंख्या के अनुपात में ही प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए तो अल्पसंख्यकों का संरक्षण कहां से आएगा? अल्पसंख्यकों के संरक्षण की बात तथा उसके साथ ही साथ जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की बात में मुझे विरोधाभास लगता है। विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात में निर्धारण करने का अर्थ तो यह होगा कि विधायिका एक छोटे पैमाने पर वैसी ही होगी जैसा कि सदन की विधायिकाओं के बाहर समाज में है। ऐसी योजना के तहत शक्ति जैसी