490 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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भारत में बुद्ध धर्म की लहर कभी कमजोर नहीं होगी
12 मई, 1956 को प्रबुद्ध भारत में एक पत्र प्रकाशित हुआ जिसमें भारतीय बौद्ध परिषद की सभी शाखाओं से 2500वीं बुद्ध जंयती मनाने का निवेदन किया गया था। तदनुसार 24 मई, 1956 को बंबई के ‘नारे पार्क’ में एक ऐतिहासिक सभा की व्यवस्था की गयी थी। इस सभा के लिए करीब पचहत्तर हजार लोग इक्ट्ठे हुए थे। सभा की अध्यक्षता बंबई राज्य के पूर्व प्रधानमंत्री श्री बालासाहेब खेर ने की। उन्होंने बुद्ध और बुद्ध के धम्म पर अपने विचार व्यक्त किये। ख्1,
उनके भाषण के बाद डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की कि वह अकबर 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेंगे। वीर सावरकर ने बुद्ध धर्म में उपदेशित अहिंसा पर कई लेख लिखे थे। डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में सावरकर पर तीक्ष्ण प्रहार किए। क्रोध में आकर डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि-
अगर हमें ठीक-ठीक पता चल जाता कि सावरकर कहना क्या चाहते हैं तो वह उनका जवाब देते। ऐसा लग रहा था कि जैसा बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के नेताओं के बीच भयंकर घमासान छिड़ गया हो। डॉ. अम्बेडकर ने गरजते हुए कहा कि जो लोग उनके उत्थान के लिए प्रयास करना चाहते हैं केवल उनको ही और उनके लोगों की आलोचना का अधिकार है। उनके आलोचक उन्हें अकेला रहने दें उन्हें और उनके लोगों को गर्त में गिरने दें।
डॉ. अम्बेडकर ने साथ-साथ कहा कि हां उनके लोग भेड़ हैं और वह उनके चरवाहे हैं। उनसे बड़ा धर्मशास्त्री कोई और नहीं है। वे उनके पीछे-पीछे चलें और धीरे-धीरे उन्हें ज्ञान प्राप्त हो जाएगा।
उनके लिए बौद्ध हिंदू धर्म से काफी अलग है। उन्होंने आगे कहा ‘‘हिंदू धर्म ईश्वर में विश्वास करता है। बौद्ध धर्म में कोई ईश्वर नहीं है। बौद्ध धर्म के अनुसार आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती है। हिंदू धर्म चतुर्वर्ण और जाति व्यवस्था में आस्था रखता है। बौद्ध धर्म में चर्तुर्वर्ण और जाति-व्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं है।’’
1 प्रबुद्ध भारत, 2 जून, 1956