157. 20.5.1956 भारत में लोकतंत्र का परिदृश्य। - Page 513

492 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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मुझे विषय दिया गया है कि, ‘‘भारत में लोकतंत्र के लिए क्या संभावनाएं हैं?’’ बहुत-से भारतीय इतने गर्व से बात करते हैं जैसे उनके देश मे पहले से ही लोकतंत्र आ चुका। और जब विदेशी भी भारत में राजनयिक सम्मान देते हुए रात्रिभोज के लिए बैठते हैं, तो वे महान भारतीय प्रधानमंत्री और महान लोकतंत्र की बातें करते हैं।

इससे यह निर्विवाद रूप से मान लिया जाता है कि जहां भी गणतंत्र है, वहां लोकतंत्र होगा ही होगा। यह भी मान लिया जाता है कि जहां जनता द्वारा वयस्क मताधिकार द्वारा चुनी गई संसद है और जहां प्रत्येक पांच सालों में जनता के प्रतिनिधियों द्वारा संसद में कानून बनाये जाते हैं, वहां पर लोकतंत्र है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोकतंत्र को राजनीतिक उपकरण समझा जाता है और यह मान लिया जाता है कि जहां यह राजनीतिक उपकरण है वहां लोकतंत्र है।

क्या भारत में लोकतंत्र है या फिर भारत में लोकतंत्र बिल्कुल ही नहीं है? सच क्या है? जब तक गणतंत्र को लोकतंत्र के समतुल्य रख देने और लोकतंत्र को संसदीय सरकार के समतुल्य रख देने से उत्पन्न हुए भ्रम को समाप्त नहीं कर दिया जाता, इस प्रश्न को कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया जा सकता।

लोकतंत्र संसदीय सरकार के साथ-साथ गणतंत्र से भी बिल्कुल अलग चीज है। सरकार चाहे संसदीय हो या फिर कोई और, लोकतंत्र की जड़ें उसमें नहीं होती हैं। लोकतंत्र केवल सरकार का स्वरूप भर नहीं है। प्राथमिक रूप से यह सामुदायिक जीवन की एक पद्धति है। लोकतंत्र की जड़ें सामाजिक संबंधों में, समाज का निर्माण करने वाले लोगों के सामुदायिक जीवन के मायनों में तलाशी जानी चाहिए।

‘समाज’ शब्द का वृहद् अर्थ क्या है? संक्षेप में कहें तो जब हम ‘समाज’ की बात करते हैं तो हम समाज की कल्पना इनके गुण-धर्म के रूप में करते हैं। इस सामूहिकता के साथ-साथ जो विशेषताएं जुड़ी होती हैं, वे हैं उद्देश्य की प्रशसीय एकनिष्ठता व कल्याण की कामना, जनहितों के प्रति आस्था और सहानुभूति एवं सहयोग की पारस्परिकता।

* ख्1, वॉइस ऑफ अमेरिका, 20 मई, 1956