157. 20.5.1956 भारत में लोकतंत्र का परिदृश्य। - Page 514

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क्या ये आदर्श समाज में दिखते हैं? भारतीय समाज व्यक्तियों से नहीं बना है। भारतीय समाज असंख्य जातियां का ऐसा जमावड़ा है जिनका जीवन परस्पर कटा हुआ है, जिनके कोई साझा जीवन अनुभव नहीं है, तथा जिनमें बंधुत्व की सहानुभूति का कोई जुड़ाव नहीं है। इस तथ्य के रहते हुए इस बिंदु के लिए तर्क करना जरूरी नहीं है। जाति व्यवस्था का अस्तित्व समाज के इन आदर्शों के अस्तित्व के लिए और इसलिए लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए भी एक साक्षात चुनौती है।

भारतीय समाज जाति व्यवस्था में इतना रचा-बसा हुआ है कि यहां हर चीज जाति के आधार पर तय होती है। भारतीय समाज में जाइए और आपको जाति बिल्कुल भयानक रूप में मिल जाएगी। कोई भारतीय किसी अन्य भारतीय के साथ केवल इसलिए विवाह नहीं कर सकता, खान-पान नहीं कर सकता, क्योंकि वह उसकी जाति से संबंधित व्यक्ति नहीं है। आप राजनीति में चले जाएं, जाति वहां भी मिल जाएगी। भारतीय व्यक्ति चुनाव में मतदान कैसे करता है? वह उस उम्मीदवार को अपना वोट देता है जो उसी की जाति से हो, न कि किसी अन्य जाति से। भारतीय कांग्रेस भी चुनाव के उद्देश्य के लिए जाति व्यवस्था का इतना शोषण करती है जितना कोई अन्य पार्टी नहीं करती है। चुनावी क्षेत्रों के सामाजिक संरचनाओं के संबंध में यदि आप इसके प्रत्याशियों की सूची की छांट करें तो पाएंगे कि उम्मीदवार उसी जाति का होगा जिस जाति का संबंधित चुनाव क्षेत्र में बाहुल्य होगा। सच तो यह कि जिस जाति के अस्तित्व को लेकर ऊपरी तौर पर कांग्रेस इतना हो-हल्ला मचाती है, उसी व्यवस्था का वह समर्थन करती है। आप उद्योगों के क्षेत्र में चले जाएं। वहां आप क्या पाएंगे? आप पाएंगे कि सबसे अधिक वेतन लेने वाले सर्वोच्च लोग उसी जाति विशेष के होंगे जिस जाति का उद्योगपति होगा। बाकी लोग उस सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर बहुत थोड़े-से वेतन के साथ जीवन-पर्यन्त चिपके रहते हैं। आप वाणिज्य के क्षेत्र में जाइए और आपको यही तस्वीर देखने को मिलेगी। पूरा वित्तीय संस्थान किसी जाति विशेष का शिविर बन जाता है जिसमें बाहरी लोगों का प्रवेश निषिद्ध होगा।

आप दान-धर्म के क्षेत्र में जाइए। एकाध अपवादों को छोड़ दें तो भारत में सभी तरह के दान-धर्म संप्रदायिक होते हैं। यदि कोई पारसी मरता है तो वह अपना धन पारसी लोगों के लिए छोड़ जाता है। यदि कोई जैन मरता है तो वह अपना जैनों के लिए छोड़ जाता है। यदि कोई मारवाड़ी मर जाता है तो वह अपना धन मारवाडि़यों के छोड़ जाता है। यदि कोई ब्राहा्रण मरता है तो अपना ध ब्राहा्रणों के लिए छोड़ जाता है। इस प्रकार पददलितों और समाज से बहिष्कृतों के लिए राजनीति