157. 20.5.1956 भारत में लोकतंत्र का परिदृश्य। - Page 515

494 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में, उद्योग में? वाणिज्य में अथवा शिक्षा में, कहीं भी कोई जगह नहीं रहती है।

जाति व्यवस्था की अन्य विशेषताएं भी हैं जो लोकतंत्र के खिलाफ है और जिनका लोकतंत्र पर बुरा असर पड़ता है। जाति व्यवस्था की ऐसी ही एक विशेषता इसमें पायी जाने वाली ‘श्रेणीगत असमानता’ है। जातियों की सामाजिक परिस्थितियां समान नहीं होती। वे एक-दूसरे से ऊपर-नीचे रहती हैं। वे एक-दूसरे से ईष्या करती हैं। यह घृणा का आरोही पैमाना है एवं उपेक्षा का अवरोही पैमाना है। जाति व्यवस्था की यह विशेषता सबसे बुरे परिणामों को जन्म देती है। यह सचेष्ट सहयोग एवं सह-भागिता को नष्ट कर देती है। जाति और वर्ग इस मामले में एक-दूसरे से भिन्न है कि वर्ग व्यवस्था का यह दूसरा कुप्रभाव है। यह इस तथ्य में भी प्रकट होता है कि जो जातियों के बीच उद्दीपन एवं प्रतिक्रिया केवल एक पक्षीय होती है। उच्च जाति के लोग मनचाहे तरीके से व्यवहार करते हैं जबकि निम्न जाति के व्यक्ति को श्वास रूप से स्थापित तरीके से ही प्रतिक्रिया देनी होती है। इसका मतलब यह है कि जब उद्दीपन एवं प्रतिक्रिया प्राप्त करने में समान अवसर नहीं है तो परिणामस्वरूप जो प्रभाव एक व्यक्ति को मालिक बना देते हैं वही दूसरों को दास के रूप में शिक्षित कर देते हैं। जब जीवन अनुभव की विभिन्न पद्धतियों का स्वतंत्र आदान-प्रदान बंध जाता है तो दोनों ही पक्षों के अनुभवां के मायने गायब हो जाते हैं। उसका परिणाम एक विघटित समाज होता है जिसमें एक सुविधा भोगी वर्ग और दूसरा वंचित वर्ग बन जाता है। इस तरह का विलगाव सामाजिक आमेलन में बाधा बनता है।

जाति व्यवस्था के दुर्गुण के रूप में एक तीसरी विशेषता भी है जो लोकतंत्र की जड़ें काट देती है। वह विशेषता यह है कि कोई जाति किसी व्यवसाय विशेष से बंधी रहती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि समाज उस समय सुव्यवस्थित होता है जब प्रत्येक व्यक्ति वह कह रहा हो जिसके प्रति उसके अंदर स्वाभविक रूझान हो ताकि दूसरों को इससे लाभ होय इसमें भी संदेह नहीं है कि यह समाज की जिम्मेदारी है कि वह इन रूझानों का पता लगाए और प्रगामी रूप से व्यक्तियों को सामाजिक उपयोग के लिए प्रशिक्षित करे। लेकिन किसी भी व्यक्ति में कार्यों और क्षमताओं की असीम बहुलताएं हो सकती हैं जिससे उस व्यक्ति विशेष की सारी क्षमताओं का उपयोग कर सके। व्यवसाय के आधार पर वर्गीकरण व्यक्ति के विकास को रोकता है, और जानबूझकर व्यक्ति का विकास होने से रोकना जानबूझकर लोकतंत्र से वंचित करना है।

जाति व्यवस्था समाप्त कैसे हो? सबसे पहली बाधा श्रेणीगत समानता में निहित है जो कि जाति व्यवस्था की आत्मा है। जहां लोग उच्च और निम्न वर्गों में बंटे हों, तो यह ज्यादा सरल है कि उच्च वर्ग के लोगों से संघर्ष करने के लिए