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निम्न वर्ग के लोग आपस में जुड़ जाएं क्योंकि निम्न वर्ग कोई एक व्यक्ति नहीं होता है। वर्ग में नीचे के लोग होते है और निम्नतर लोग होते हैं। नीचे के लोग निम्नतर लोगों में नहीं मिल पाते हैं। क्योंकि उन्हें भय होता है कि यदि वे अपने से नीचे वालों (अर्थात् निम्नतर) को ऊपर उठाने में सफल हो जाएंगे तो वे स्वयं उस उच्चतर स्थिति को खो देंगे जो उन्हें और उनकी जाति को प्राप्त है।
दूसरी बाधा यह है कि भारतीय समाज एकजुट होकर कार्य करने में अक्षम हैं। यह नहीं जानता है कि सबाक हित किस में है। प्लेटो ने कहा है कि समाज का संगठन अंततः इस ज्ञान पर निर्भर करता है कि उसके अस्तित्व का लक्ष्य क्या है। अगर हमें इसका अंतिम लक्ष्य पता नहीं है, अगर हमें यह पता नहीं है कि इसका हित किस में है तो हम संयोग और दुर्घटनाओं पर आश्रित हो जाएंगे। जब तक हमें अंतिम लक्ष्य की अच्छाइयों के बारे में पता नहीं होगा, तो तर्कसंगत रूप से यह तय करने के लिए हमारे पास कोई पैमाना ही नहीं होगा कि किन-किन संभाव्यताओं को हमें आगे बढ़ने देना है। सवाल है कि क्या भारतीय समाज अपनी जातीय संरचना की मौजूदा दशा के साथ उस मूल प्रश्न को प्राप्त कर सकेगा? अब हम सबसे विकट बाधा से रूबरू होते हैं कि जब तक एक न्यायपूर्ण और सौहार्दपूर्ण सामाजिक व्यवस्था का अस्तित्व संभव है? भारतीयों की मस्तिष्क सर्वत्र झूठे दृष्टिकोणों और झूठे मूल्यों द्वार भ्रमित और लक्ष्य से भटका हुआ है। एक विघटित और विभाजित समाज कई-कई आदर्श और मानक स्थापित करता है। ऐसी स्थिति में जाति के मुद्दे पर किसी भारतीय व्यक्ति के लिए सधी हुई मानसिकता पर पहुंच पाना नामुमकिन है।
क्या शिक्षा जाति को समाप्त कर सकती है? जवाब ‘हां’ भी है और ‘ना’ भी। यदि शिक्षा वैसे ही दी जाती रही जैसी कि यह आज है तो जाति पर इसका कोई असर नहीं होगा। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है ब्राहा्रण जाति। ब्राहा्रण शत-प्रतिशत शिक्षित हैं, या फिर कह लें कि अधिकांश ब्राहा्रण उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। लेकिन एक भी ब्राहा्रण ने अपने को जाति के विरुद्ध प्रदर्शित नहीं किया है। दरअसल उच्च जाति का शिक्षित व्यक्ति शिक्षित होने के बाद, उस समय की तुलना में जब वह अशिक्षित था, जाति व्यवस्था बनाये रखने में और अधिक रूचि लेने लगता है। क्योकि बड़ी नौकरियां पाने के अतिरिक्त अवसर खोलकर शिक्षा उसे जाति व्यवस्था बनाये रखने के लिए और भी रूचि प्रदान कर देती है।
इस दृष्टिकोण से जाति को समाप्त करने के लिए शिक्षा एक साधन के रूप में उपयोगी नहीं है। यहां तक तो शिक्षा का नकारात्मक पक्ष है। लेकिन समाज के निचले तबके में लागू किये जाने पर शिक्षा उद्धारक हो सकती है। यह विद्रोह