157. 20.5.1956 भारत में लोकतंत्र का परिदृश्य। - Page 517

496 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की उस भावना को भड़का देगी। अज्ञानता की अपनी मौजूदा स्थिति में वे जाति व्यवस्था के समर्थक हैं। एक बार आंखे खुल जाने पर वे जाति व्यवस्था से लड़ने के लिए तत्पर हो जाएंगे।

वर्तमान नीतियों में दोष यह है कि यद्यपि शिक्षा व्यापक पैमाने पर दी जा रही है, यह भारतीय समाज के सही पात्र, तबके को नहीं दी जा रही ह। यदि आप भारतीय समाज के उस तबके को शिक्षा देते हैं जिसका जाति व्यवस्था से प्राप्त लाभों के कारण इसे बनाये रखने में निहित स्वार्थ है, तो जाति व्यवस्था मजबूत होगी। वही दूसरी तरफ यदि आप भारतीय समाज के उस निम्नतम तबके को शिक्षा प्रदान करते हैं जो जाति व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहते हैं, तो जाति व्यवस्था उखड़ जाएगी। वर्तमान में भारत सरकार तथा अमेरिकन फाउंडेशन द्वारा शिक्षा को जो अंधाधुंध सहायता मिल रही है, वह जाति व्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगी। अमीर को और अमीर तथा गरीब को और गरीब बनाना, गरीबी का उन्मूलन करने का तरीका नहीं है।

जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए शिक्षा को एक साधन के रूप में इस्तेमाल करने के संबंध में भी यही लागू होता है। ऐसे लोगों को शिक्षा देना जो जाति व्यवस्था कायम रखना चाहते हैं। भारत में लोकतंत्र के लिए संभावनाओं में सुधार लाना नहीं, बल्कि हमारे भारत के लोकतंत्र को और बड़े संकट में डालना है।

हस्ता. भीमराव अम्बेडकर

26, अलीपुर रोड

नई दिल्ली

दिनांक 20 मई, 1956

लोकतंत्र में सभी को, चाहे वे दलि.... हों, शोषित हों जिन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया हो और जो सारा बोझ ढो रहे हों या फिर चाहे वे हों जिन्हें सारी सुविधाएं प्राप्त हैं, एक ही प्रकार से मतदान का अधिकार है। और संभवतरु सुविधा संपन्न लोग संख्या में सुविधाविहीन लोगों से कम ही है। चूंकि इस बहुमत के नियम को निर्णय का नियम मानते हैं, बहुत संभव है कि यदि कुछ सुविधासंपन्न लोग स्वेच्छा से और इच्छापूर्वक अपनी सुविधाएं नहीं छोड़ते हैं तो उनके और निम्नतर वर्गों के बीच की दूरी लोकतंत्र को नष्ट कर देगी और किसी बिल्कुल नयी चीज को जन्म देंगी। इसलिए मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि अगर आप संसार के विभिन्न हिस्सों में लोकतंत्र के इतिहास की जांच करें तो पाएंगे कि इन सामाजिक