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रिश्तेदारों को उस गांव के तमाम मुर्दा जानवरों को ढोकर ले जाना और 500 रु. की आमदनी करनी चाहिए। आपको यह लाभ उठाना चाहिए। उसके अलावा मैं आपको 500 रु. देने का इंतजाम करूंगा। मेरे लोगों का क्या होता है, उनको खाना और कपड़ा मिलता है या नहीं, यह मैं देखूंगा। फिर आप यह फायदा क्यों छोड़ रहे हैं? आप वह खुद क्यों नहीं करते? अगर हम करें तो यह लाभप्रद है अगर आप करें तो लाभप्रद क्यों नहीं है? चलिए मरे जानवरों को ढोइए।’’
कल मेरे पास एक ब्राहा्रण लड़का आया और बोला, ‘‘संसद और विधानसभा में आपको आरक्षित सीटें दी गई हैं। आप उनको छोड़ क्यों रहे हो?’’ मैंने कहा, ‘‘आप महार बन जाइए और संसद तथा विधानसभा की उन सीटों को भर दीजिए। नौकरियों में खाली जगहें भर गई है, इसलिए पदों के लिए ब्राहा्रण और अन्य आवेदन देते हैं। आप ब्राहा्रण लोग महार बनकर इन आरक्षित सीटों को वैसे ही क्यों नहीं भर देते जैसे कि आप नौकरियों के मामले में करते हैं?’’
उनसे मेरा सवाल है कि हमारे नुकसान पर आप क्यों रोते हैं? वास्तव में मनुष्य को आत्म-सम्मान अधिक प्यारा है भौतिक लाभ से। सद्गुणी और चरित्रवान स्त्री को पता होता है कि अनैतिक आचरण में कितना लाभ है। हमारी बंबई में वेश्याओं का मोहल्ला है। ये औरतें सुबह 8 बजे सोकर उठती हैं और पास के होटल में नाश्ते का आर्डर देती हैं। (डॉ. अम्बेडकर ने इसकी आवाज बदलकर नकल उतारी) ‘‘ये सुलेमान एक प्लेट कीमा और रोटी देना।’’ सुलेमान चाय, केक के साथ यह लाता है। लेकिन मेरी गरीब बहनों को सादी चटनी खाकर (नमक-मिर्च की चटनी और रोटी) तक नसीब नहीं होती, पर वे सम्मान और चरित्र के साथ रहती है।
हम आदर और आत्म-सम्मान के साथ लड़ रहे हैं। हम मानव मात्र को पूर्णता की ओर ले जाने को तैयार हो रहे हैं, और इसके लिए हम कोई भी बलिदान करने के लिए तैयार हैं। ये अखबार के लोग (उनकी ओर इशारा करते हुए) मेरे पीछे चालीस साल से पड़े हैं। आज तक उन्होंने मुझे कितना बदनाम किया है। मैं उनसे कहता हूं कि वे कम से कम अब तो विचार करें, इस बचपने को छोड़ें और समझदार बनें।
बौद्ध धर्म अंगीकार करने के बाद भी मुझे विश्वास है मुझे राजनीतिक अधिकार मिलेंगे (डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर के नाम के नारे और जोरदार तालियां)। मैं नहीं कह सकता कि मेरी मृत्यु के बाद क्या होगा। इस आंदोलन के लिए हमें अधिक संघर्ष करना पड़ेगा। बौद्ध धर्म स्वीकार करने से क्या होगा, ये सारी कठिनाइयां हैं, इनसे कैसे बचा जा सकता है। मैंने इस पर विस्तार से सोचा है कि क्या कहना है