158. 15.10.1956 बौद्ध धर्म विश्व का उद्धारक होगा - Page 532

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का विकास करना चाहिए। मस्तिष्क को सुसंस्कृति बनाना चाहिए। मैं ऐसे देश या ऐसे लोगों से कोई संबंध रखना नहीं चाहता जो कहते हैं कि मनुष्य और सुसंस्कृत मस्तिष्क के बीच भोजन के सिवा और कोई अंतर नहीं। लोगों के साथ संबंध रखने के लिए जिस प्रकार मनुष्य के पास स्वस्थ शरीर होना चाहिए, उसी प्रकार शरीर को स्वस्थ बनाने के साथ-साथ मस्तिष्क को भी सुसंस्कृत करना जरूरी है। अन्यथा यह नहीं कहा जा सकता है कि मानव जाति ने प्रगति की है।

मनुष्य का शरीर या मस्तिष्क बीमार क्यों है? इसका कारण यह है कि या तो उसका शरीर रोगी है अथवा उसके मस्तिष्क में कोई उत्साह नहीं है। अगर मस्तिष्क में उत्साह नहीं तो प्रगति संभव नहीं। वहां यह उत्साह क्यों नहीं है? पहला कारण तो यह है कि इंसान को इस तरह से रखा गया है कि उसे उठने का कोई अवसर नहीं मिले या उसे कोई आशा न हो। ऐसे में वह उत्साहित कैसे रहेगा? वह बीमार रहेगा। जिस व्यक्ति को उसके कामों का फल मिलता है वह उत्साहित रहेगा। नहीं तो स्कूल का मास्टर कहने लगेगा, ‘‘‘यहा कौन है? महार है। महार पहला दर्जा कैसे पास करेगा? उसे पहला दर्जा क्यों चाहिए? तीसरे में ही बने रहो, पहला दर्जा ब्राहा्रण के लिए है।’’ इस हालत में लड़के को क्या उत्साह मिलेगा? वह प्रगति कैसे कर सकता है? उत्साह पैदा करने की जड़ उस मस्तिष्क में है जिसका शरीर और मस्तिष्क भी स्वस्थ है, जो साहसी है और जिसमें विपरीत परिस्थितियों को पार करने का विश्वास है। उत्साह उसी मैं पैदा होता है और केवल वह ही आगे बढ़ता है। हिंदू धर्म में एक ऐसा दर्शन शामिल किया गया है जो कभी भी उत्साह को प्रोत्साहन नहीं दे सकता है। मनुष्य को उत्साहहीन बनाने की परिस्थितियां हजारों वर्ष से बनाए रखी गई हैं, जिनमें ज्यादातर ऐसे लोग पैदा कि जाएंगे जो अपना पेट बाबूगीरी से पालेंगे। और क्या होगा? अपने बाबुओं को बनाए रखने के लिए एक बड़ा बाबू चाहिए।

मनुष्य के उत्साह के पीछे उसका मस्तिष्क है। आप मिल मालिकों को जानते हैं? अपनी मिलों के लिए वे मैनेजर रखते हैं और उनमें मजदूर से काम मैनेजर का द्वारा लेते हैं। मिल मालिक एक ना एक बुरी आदतों में फंसे रहते हैं। उनका मस्तिष्क सांस्कृतिक रूप से विकसित नहीं होता। हमने अपने मस्तिष्क में उत्साह भरने का आंदोलन प्रारंभ किया, उसके बाद शिक्षा शुरू की जाएगी। मैंने अपनी पढ़ाई धोती-लंगोटी पहन शुरू की थी। स्कूल में मुझे पीने को पानी तक नहीं मिलता था। स्कूल में मैंने बहुत-से दिन पानी के बिना ही काटे थे। यह स्थिति बंबई के एलफिंस्टन कॉलेज तक में बनाए रखी गई थी। इन हालात में और क्या पैदा होगा-सिवाय क्लर्कों के, बाबुओं के।

जब मैं दिल्ली की कार्यपरिषद में था, तब वायसराय लार्ड लिन्लिथगो थे।