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इन तीन वर्णों के सिवा क्या किसी अन्य को उत्साह होगा? चतुर्वर्ण व्यवस्था संयोगवश नहीं है यह कोई रिवाज नहीं है यह धर्म है। हिंदू धर्म में कोई समानता नहीं। एक बार मैं श्री गांधी के पास था। उन्होंने कहा, ‘‘मैं चतुर्वर्ण में विश्वास करता हूं?’’ मैंने कहा, ‘‘आप जैसे महात्मा चतुर्वर्ण में विश्वास करते हैं। लेकिन यह चतुर्वर्ण है क्या और कैसे है?’’ (डॉ. अम्बेडकर ने अपने हाथ उंगलियों को एक के ऊपर और हथेली को चौरस स्थिति में रखते हुए व्यक्त किया था)। यह चतुर्वर्ण ऊपर है या चौरस? चतुर्वर्ण कहां से शुरू होता है और कहां खत्म होता है? गांधीजी ने इसका उत्तर नहीं दिया और इसका क्या उत्तर देते? जिन्होंने हमें बर्बाद किया है वे इसी धर्म से तबाह होंगे। मैं इस हिंदू धर्म पर अनावश्यक आरोप नहीं लगाता। हिंदू धर्म से कोई समृद्ध नहीं होगा। यह धर्म अपने आप में विनाशक धर्म है। हमारा देश विदेशियों के शासन में क्यों पहुंचा? 1945 तक यूरोप ने युद्ध देखे हैं। चाहे जितने सैनिक मारे गए हों उनकी जगह नई भर्ती से उतने ही सैनिक आ जाते थे। उस समय कोई यह नहीं कह सकता था कि हमने युद्ध जीत लिया। हमारे देश में सब कुछ अलग है अगर क्षत्रिय मारे जाते हैं, हमारा सत्यानाश हो जाता है। अगर हमारे पास हथियार रखने का अधिकार होता, तो इस देश को गुलाम नहीं होना पड़ता। इस देश को कोई नहीं जीत पाता।
हिंदू धर्म में बने रहकर कोई भी किसी भी तरह से संपन्न नहीं हो सकता। स्तरीकरण के चलते तथ्य यह है कि लाभ ऊंचे वर्णों और जातियों का होता है। लेकिन दूसरे? बच्चे को जन्म देते ही ब्राहा्रण स्त्री की आंखे हाईकोर्ट के उस पद पर लग जाती है कि वो वहां खाली पड़ा है। इसके विपरीत जब एक मेहतर स्त्री बच्चे को जन्म देती है, तो उसकी आंखे मेहतर के पद पर लगती हैं, कि वो कहां
खाली पड़ा है। इस प्रकार के विचित्र सामाजिक ढांचे के लिए जिम्मेदार हैं हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था। इसमें क्या विकास हो सकता है? संपन्नता केवल बौद्ध धर्म से आ सकती है।
बौद्ध धर्म में पचहत्तर फीसदी भिक्षु ब्राह्मण थे। शूद्र और अन्य पच्चीस फीसदी थे। लेकिन भगवान बुद्ध ने कहा, ‘हे भिक्षुओं, तुम भिन्न-भिन्न देशों और जातियों से आए हो। नदियां जब अपने-अपने क्षेत्रों में बहती हैं वे अलग-अलग बहती हैं, लेकिन जब वे सागर में मिलती हैं तो अपनी पहचान खो देती हैं। वे एक और एक समान हो जाती हैं। बौद्ध संघ एक सागर के समान है। इस संघ में सब बराबर हैं।’’ सागर में मिल जाने के बाद गंगा या महानदी के पानी को पहचाना नहीं जा सकता है। इस तरह से जब हम बौद्ध संघ में सम्मिलित होते हैं, हम अपनी जाति
खो देते हैं और एक समान बन जाते हैं। इस प्रकार की समानता का उपदेश केवल एक महान व्यक्ति ने दिया था, और वह महान व्यक्ति हैं भगवान बुद्ध (तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट)।