518 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ऐतिहासिक घटना के बारे में श्रद्धेय डी. वलीसिंहा लिखते हैं :
‘‘आधुनिक भारत के इतिहास में 14 अक्तूबर, 1956 का दिन स्मरणीय था। अपने पांच लाख अनुयायियों के साथ डॉ. अम्बेडकर ने इसी दिन त्रिसरना एवं पंचशील का पाठ किया। इस महान घटना का स्थल महाराष्ट्र प्रदेश के नागपुर नगर में चालीस एकड़ जमीन का खाली टुकड़ा था। उस पर समारोह के लिए एक विशाल पंडाल लगाया गया था। मुझे इसमें आमंत्रित किए जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, और त्रिसरना तथा पंचशील के प्रत्येक शब्द को दोहराती हुई मानवता के इतने विशाल समूह का अपूर्व दृश्य मेरी स्मृति में अभी तक स्पष्ट बना हुआ है। मैंने अपने जीवन में कभी इतने उत्साहित जनसमूह को नहीं देखा। पिछली पूरी रात को और 14 अक्तूबर को पूरी सुबह आकाश ‘भगवान बुद्ध की जय’ के नारों से गूंजता रहा था। पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों के विशाल समूह, जिनमें से कुछ लोगों के हाथों में बच्चे थे और कुछ बौद्ध धर्म की पताकाओं को हाथ में लिए थे, देश के सभी भागों से अंतहीन धाराओं में आकर अहाते में जमा होते जा रहे थे। अहाते में अपना स्थान पाने की प्रतीक्षा में हजारों सड़क के किनारे बैठे थे। हमने पूरे शहर का चक्कर लगाया और हम वहां भी गए। हमने एक के बाद एक जुलूसों को सभा स्थलों की ओर बढ़ते देखा। उस जगह तक पहुंचने के बाद स्वयंसेवकों ने बड़ी कठिनाई से हमारी कार को मंच के पीछे तक पहुंचने का रास्ता बनाया था। मंच से चारों ओर नजर दौड़ाने पर मुझे मानव सिरों के सागर के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। पूरा दृश्य वास्तव में हृदय में हिलोरें भरने वाला था। यह अपूर्व था। जीवित स्मृति में इतने विशाल स्तर पर धर्मांतरण कभी नहीं हुआ था। डॉ. अम्बेडकर की सेहत बहुत अच्छी नहीं थी, पर बौद्ध धर्म को ग्रहण करने के कारणों को स्पष्ट करते हुए वह एक घंटे से अधिक तक बोले। वहां एकत्र जनसमूह को स्वयं उन्होंने पंचशील वचन दिए और उसने इन शब्दों को एक स्वर में दोहराया। वो आवाज अवश्य ही काफी दूर तक गई होगी। महाबोधि सोसाइटी की ओर से डॉ. अम्बेडकर को जब मैंने भगवान बुद्ध की प्रतिमा भेंट की और माला पहनाई तो मेरे गालों पर
खुशी के आंसू बहने लगे। महाबोधि सोसाइटी को उनमें 70 वर्ष के अपने प्रयास सफल हुए थे।’’