5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 54

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नहीं कर सकता। यह इस प्रकार है। सबसे पहले बहुसंख्यक समुदाय व अल्पसंख्यक समुदाय में आपसी समझौते द्वारा एक अंक पर सहमति बनाई जाए कि प्रतिनिधित्व के जनसंख्या अनुपात में कितनी अधिकतम वृद्धि की जाएगी और इसको अधिमान गुणनखंण्ड पुकारा जाए। उपयोग में किसी एक विशेष अल्पसंख्यक के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए अधिमान गुणनखंड उस अल्पसंख्यक वर्ग के सामाजिक स्तर के विपरीत अनुपात के आधार पर घटना/बढ़ना चाहिए और इसकी परिभाषा (1) सामाजिक स्तर (2) इसकी धन शक्ति (3) शैक्षणिक स्थिति पर आधारित होनी चाहिए। मुझे ऐसा लगता है कि अगर हम ऐसा कर लें तो भिन्न-भिन्न अल्पसंख्यक समुदायों/वर्गों में आम मत हो जाएगा और अल्पसंख्यक वर्गों व बहुसंख्यक वर्गों में भी न्याय और समानता के आधार पर एकमत हो जाएंगे तथा किसी भी किस्म की शिकायत की गुंजाइश नहीं रहेगी।

  1. हमारे लिए अगला विचारणीय प्रश्न निर्वाचक मंडल तथा मताधिकार से सम्बन्धित है। मित्रो, इस सम्बन्ध में हमारी मांग क्या होगी? निर्वाचक मंडल गठित करने के लिए हमारे पास दो विकल्प हैं। एक है अलग-अलग निर्वाचक मंडल बनाना व दूसरा विकल्प मिले जुले निर्वाचक मंडल में आरक्षित स्थानां की योजना। मुझे मालूम है कि इस विषय पर दलित वर्ग की राय विभाजित है। बहुत से लोगों का यह विचार है कि निर्वाचक मंडल अलग अलग होने चाहिएं। उन्हें यह डर है कि संयुक्त निर्वाचक मंडल प्रणाली में बहुसंख्यक वर्ग के मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय हमारे उम्मीदवारों में केवल उन्हें मतदान करेंगे जो उनसे दबकर रहने वाले हों। मैं यह नहीं कहता कि यह डर निराधार हैं। परन्तु अगर यह सत्य है तो इस का हल निर्वाचन मण्डल को दो अलग-अलग भागों में बांटने में नहीं है बल्कि वयस्क मतदान की मांग द्वारा मतदाता शक्ति अधिक से अधिक बढ़ाने में है ताकि बहुसंख्यक समाज का हमारे प्रतिनिधियों के चुनाव में पड़ने वाला प्रभाव न्यूनतम या बिल्कुल न हो। हमें व्यस्क मतदान की मांग पर अड़ना बहुत जरूरी है। क्योंकि यह हमारी बहुत आवश्यक मांग है तथा संयुक्त निर्वाचन मंडल के साथ दलित वर्ग के लिए आरक्षित स्थानों की योजना लागू होने पर हमें विरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

  2. इस संबंध में मैं एक टिप्पणी करना आवश्यक समझता हूँ कि इस बात पर किसी को कोई एतराज नहीं हो सकता कि हमारा देश जाति व धर्म के आधार पर विभाजित है और जब तक अल्पसंख्यक समुदायों के बचाव के लिए संविधान में विशेष प्रावधान व अधिनियम लागू नहीं होते ये एक संगठित एवं