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साथ देखता हूं। इन देशों की युवा पीढ़ी अगर यह नहीं समझ पाती कि बौद्ध धर्म द्वारा प्रस्तावित जीवन पद्धति कम्युनिज्म द्वारा प्रस्तुत जीवन पद्धति से बेहतर है, तो बौद्ध धर्म का अंत निश्चित है। यह एक या दो पीढि़यां से अधिक जीवित नहीं रह सकता है। अतः जो लोग युवा पीढ़ी को नियंत्रित करने के लिए बौद्ध धर्म में विश्वास करते हैं, उनको यह बताना बहुत आवश्यक है कि कम्युनिज्म का स्थान क्या बौद्ध धर्म ले सकता है। बौद्ध धर्म केवल तब ही बने रहने की आशा कर सकता है। हम सबको याद रखना चाहिए कि आज यूरोप के लोगों का विशाल बहुमत और एशिया के युवाओं को विशाल बहुमत कार्ल मार्क्स को ही मसीहा मानता है जिसकी पूजा की जा सकती है। और वे मानते हैं कि बौद्ध संघों को विशाल भाग संकट मात्र है। कार्ल मार्क्स से अपनी तुलना तभी प्रतिस्पर्धा कर सकता है।
उस भूमिका के साथ मैं आपको बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद या कम्युनिज्म की मुख्य विशेषताएं बताना चाहूंगा ताकि आप यह देख सकें कि दोनों के बीच समानताएं क्या हैं और अंतर क्या है। और तीसरे, क्या लक्ष्य तक पहुंचने की बौद्ध जीवन पद्धति स्थायी है अथवा क्या लक्ष्य को प्राप्त करने का कम्युनिस्ट मार्ग स्थायी है। क्योंकि उस मार्ग पर चलने का कोई लाभ नहीं जो स्थायी होने नहीं जा रहा है अगर आपको यह जंगल में ले जा रहा है, या अराजकता की ओर ले जा रहा है, तो उस पर चलने का कोई फायदा नहीं। लेकिन अगर आपको विश्वास है कि आपसे जिस मार्ग पर चलने को कहा जा रहा है, वो धीमा है, वो टेढ़ा-मेढ़ा हो सकता है, उसमें लंबे-लंबे घुमाव हो सकते हैं, पर अंततया यह आपको सुरक्षित, ठोस आधार पर ले जाता है, ताकि जिन अन्य आदर्शों का पीछा कर रहे हैं वे वहां आपकी मदद करने, आपके जीवन को स्थायी रूप से ढालने के लिए मौजूद हैं, तो मेरे विचार से, तेजी से ऊपर पड़ने और उस पर चलेन, जिसे हम शॉर्ट कट ‘छोटा रास्ता’ कहते हैं, की अपेक्षा धीमें, टेढ़े-मेढ़े चक्करदार रास्ते पर चलना बेहतर है। जीवन में शॅर्ट कट हमेशा खतरनाक होते हैं, बहुत खतरनाक। अब मैं विषय पर आता हूं। कम्युनिज्म का सिद्धांत क्या है? यह किससे शुरू होता है? कम्युनिज्म इस सिद्धांत के साथ शुरू होता है कि दुनिया में शोषण है और धनी लोग निर्धनों का शोषण अपनी संपत्ति के कारण करते हैं और आमजन को गुलाम बनाते हैं, और यह गुलामी दुख और दरिद्रता पैदा करती है। कार्ल मार्क्स का यही प्रस्थान बिंदु है। कार्ल मार्क्स इसका क्या इलाज बताते हैं? वह यह कहते हैं कि एक वर्ग की निर्धनता और तकलीफों से बचाने के लिए निजी संपत्ति को समाप्त करना जरूरी है। किसी को निजी संपत्ति नहीं रखनी चाहिए क्योंकि इसका उपयोग या दुरुपयोग निजी मालिक ही करता है। कार्ल मार्क्स की तकनीकी भाषा में, मजदूर जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करता है, वो मजदूर को नहीं मिलता। उसको मालिक हड़प लेता है।