158. 15.10.1956 बौद्ध धर्म विश्व का उद्धारक होगा - Page 543

522 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कार्ल मार्क्स यह प्रश्न पूछते हैं कि उस अतिरिक्त मूल्य को मालिक को क्यों हड़पा जाना चाहिए जिसको मेहनतकश मजदूर अपनी मेहनत से पैदा करता है? उनका स्तर है कि मालिक केवल राज्य है। और इसी के चलते कार्ल मार्क्स ने उस सिद्धांत का प्रतिपालन किया कि सर्वहारा की तानाशाही होनी चाहिए। यह कार्ल मार्क्स की तीसरी प्रस्थापना है। सरकार शोषित वर्गों की होनी चाहिए, सर्वहारा की तानाशाही का यही अर्थ है। रूस में कम्युनिज्म का आधार कार्ल मार्क्स की ये मूल प्रस्थापनाएं ही हैं। ‘निस्संदेह उनका विस्तार भी किया गया है, और उनमें जोड़ा भी गया है, इत्यादि। लेकिन प्रस्थापनाएं ये ही हैं।

आइए अब थोड़ी देर के लिए हम बौद्ध धर्म पर विचार करते और देखते हैं कि कार्ल मार्क्स द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर बुद्ध क्या कहते हैं। जैसा कि मैं बता चुका हूं, कार्ल मार्क्स उस बात से शुरू करते हैं जिसे वह गरीबों का शोषण कहते हैं। इस प्रश्न पर बुद्ध का क्या मत है? वह कहां से शुरू करते हैं? अपने धर्म के ढांचे को उन्होंने किस आधारशिला पर स्थापित किया है? बुद्ध ने 2000 या कम से कम 2400 साल पहले ठीक यही बात कही थी। उन्होंने कहा था, ‘‘जगत में दुख है।’’ उन्होंने शोषण शब्द का प्रयोग नहीं किया था लेकिन अपने धर्म की आधारशिला उन्होंने उस पर स्थापित की थी जिसे उन्होंने दुख कहा था। जगत में दुख है इसमें कोई संदेह नहीं कि दुख शब्द की व्याख्या अनेक प्रकार से की गई है। इसकी व्याख्या पुनर्जन्म अर्थात् जीवन के अर्थ में की गई है। मैं इससे सहमत नहीं। बौद्ध साहित्य मैं ऐसे बहुत-से स्थान हैं जहां दुख शब्द का प्रयोग निर्धनता के अर्थ में किया गया है। अतः जहां तक आधारशिला का संबंध है वास्तव में कोई भी अंतर नहीं है।

बौद्धों को आधारशिला तक पहुंचने के लिए कार्ल मार्क्स पर जाना जरूरी है। वहां आधारशिला पहले से मौजूद है, और भली-भांति स्थापित थी। बुद्ध अपना पहला प्रवचन, धर्म चक्र प्रवर्तन सूक्त यहीं से शुरू करते हैं। अतः मैं यह कहूंगा कि जो लोग कार्ल मार्क्स के प्रति आकर्षित हैं उनको धर्म परिवर्तन सूकत पढ़ना और यह समझना चाहिए कि इस बारे में बुद्ध क्या कहते हैं। और इस सबंध में आपको काफी संतोष मिलेगा। बुद्ध ने अपने धर्म की आधारशिला न तो ईश्वर पर स्थापित की थी और न ही आत्मा पर अथवा ऐसी किसी अलौकिक वस्तु पर। उन्होंने अपनी उंगली जीवन की इस वास्तविकता पर रखी थी कि लोग दुख में रह रहे हैं। इसलिए जहां तक मार्क्सवाद या कम्युनिज्म का ताल्लुक है, बौद्ध मत में यह सब पर्याप्त है। और यह सब बुद्ध ने मार्क्स के जन्म लेने से 2000 साल पहले कहा था।

हम इसे गुणधर्म का सवाल मानते हैं। आप पाएंगे कि बुद्ध की शिक्षाओं और कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों में कहीं कुछ भारी समानता है। कार्ल मार्क्स ने कहा