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था कि शोषण रोकने के लिए उत्पादन के साधन अर्थात् संपत्ति का स्वामित्व राज्य के पास होना चाहिए। धरती राज्य की होनी चाहिए, उद्योग पर राज्य का अधिकार होना चाहिए ताकि कोई भी निजी मालिक हस्तक्षेप न कर सके और मजदूर की मेहनत के लाभ को लूट न सके।
आइए अब हम संघ, बौद्ध संघ की बात करें और उन नियमों को देखें जो बुद्ध ने मठवासियों के लिए निर्धारित किए थे। वे नियम क्या थे? बुद्ध ने कहा था कि किसी भी मठवासी की अपनी निजी संपत्ति नहीं होगी। अगर आदर्श की बात करें तो कोई भी मठवासी निजी संपत्ति का स्वामी नहीं हो सकता है। और हालांकि यहां कुछ कमियां हो सकती हैं, और कुछ देशों में मैंने मठवासियों को निजी संपत्ति का स्वामी होते देखा है, पर बहुलांश मामलों में मठवासियों के पास कोई निजी संपत्ति नहीं होती। वास्तव में संघों के लिए बौद्ध नियम उन से कहीं अधिक कड़े हैं जो कम्युनिस्टों ने रूस में बनाए है। मैं इसे एक ऐसे विषय के रूप में लेता हूं जिस पर अभी तक न तो किसी ने चर्चा की है और ना ही कोई निष्कर्ष निकाला है। बुद्ध ने संघों का गठन किस उद्देश्य ये किया था? उन्होंने ऐसा क्यों किया? थोड़ा इतिहास में मुड़ा जाए। बुद्ध जब उस धर्म को प्रसारित करने में लगे थे जिसे आज हम ‘परिव्राजक’ कहते हैं, तो वो उनसे बहुत पहले से मौजूद था। ‘परिव्राजक’ शब्द का अर्थ विस्थापित व्यक्ति है जिसने अपना घर
खो दिया है। कदाचित आर्य काल के दौरान आर्यों के विभिन्न कबीले एक-दूसरे के विरूद्ध युद्धरत थे जैसा कि सभी जनजातियों में होता है। कुछ छिन्न-भिन्न बचे हुए समूह अपनी भूमि खो बैठे और इधर-उधर भटकने लगे थे। इन्हीं घुमंतुओं को ‘परिव्राजक’ कहा गया था। बुद्ध ने इन ‘परिव्राजकों’ को एक निकाय में संगठित किया और जीवन के जो नियम दिए थे वे ‘विनयपिटक’ में हैं। इन नियमों में भिक्षु को संपत्ति रखने की अनुमति नहीं है। भिक्षु केवल सात वस्तुएं रख सकता है-एक उस्तरा, पानी के लिए लोटा, एक भिक्षापात्र और तीन चीवार और सिलाई के लिए सुई। तो मैं जानना चाहूंगा कि यदि कम्युनिज्म का सार निजी संपत्ति को अस्वीकार करना है तो निजी संपत्ति को लेकर क्या उससे अधिक बड़े और अधिक कड़े नियम हो सकते हैं जो ‘विनयपिटक’ में मिलते हैं। मुझे ऐसा एक भी नहीं मिलता। इसलिए अगर कोई लोग या युवा कम्युनिस्ट व्यवस्था में निहित नियमों की ओर आकर्षित होते हैं कि कोई निजी संपत्ति नहीं होगी, तो वे इनको यहां पा सकते हैं। प्रश्न केवल यह है कि निजी संपत्ति को अस्वीकार करने के इस नियम को किस सीमा तक पूरे समाज पर लागू किया जा सकता है? यह मामला औचित्य, समय, परिस्थितियों और मानव समाज के विकास का है। परंतु जहां तक सिद्धांत का प्रश्न है निजी संपत्ति को समाप्त करने में यदि कुछ गलत नहीं है तो जो कोई यह करना चाहता है तो बौद्ध धर्म उसके रास्ते में नहीं आता क्योंकि बौद्ध संघों को निर्माण में इसने इसका अनुमोदन पहले से ही कर रखा है।