158. 15.10.1956 बौद्ध धर्म विश्व का उद्धारक होगा - Page 545

524 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अब हम विषय के दूसरे पक्ष की ओर बढ़ते हैं और वो यह है कि कम्युनिज्म को लाने के लिए कार्ल मार्क्स या कम्युनिज्म किन उपायों का इस्तेमाल करना चाहते हैं? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। कम्युनिज्म जिससे मेरा आशय दुरूख को स्वीकारने और निजी संपत्ति की समापित से है, को लाने के लिए कम्युनिस्ट अपने विरोधी के विरुद्ध हिंसा और हत्या का रास्ता अपनाना चाहते हैं। बुद्ध और मार्क्स के बीच मूलभूत अंतर यही है। सिद्धांत को स्वीकार करने के लिए बुद्ध का तरीका लोगों को समझाने-बुझाने का, नैतिक शिक्षा का और प्रेम का है। वह इस सिद्धांत को आत्मसात कराकर विरोधी को जीतना चाहते हैं कि सब कुछ प्यार से जीता जा सकता है शक्ति से नहीं। मूलभूत अंतर इसी में निहित है कि बुद्ध हिंसा की अनुमति नहीं देते, कम्युनिज्म देते हैं। इसमें संदेह नहीं कि कम्युनिस्टों को सीधे परिणाम मिलते हैं, क्योंकि जब आप लोगों को समाप्त करने के उपाय का सहारा लेते हैं तो वे आपका विरोध करने के लिए बचते ही कहां हैं।

आप अपनी विचारधारा के साथ चलिए, आप काम करने के अपने ढंग से चलिए। जैसा कि मैं कह चुका हूं, बुद्ध का रास्ता लंबा है, और कुछ लोग शायद इसे कठिन कह सकते हैं। लेकिन मुझे कोई संदेह नहीं कि यही सुनिश्चित मार्ग है।

अपने कम्युनिस्ट मित्रों से मैंने हमेशा दो या तीन प्रश्न किए हैं और मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि वे उनके ऊपर उत्तर नहीं दे पाए। जिसे सर्वहारा की तानाशाही कहते हैं, उसे वे हिंसा के द्वारा स्थापित करते हैं। वे संपत्ति रखने वाले सभी लोगों से उनके राजनीतिक अधिकार छीन लेते हैं। वे विधानसभा में अपना प्रतिनिधि नहीं रख सकते हैं। उनको मत देने का अधिकार नहीं हो सकता है। उनको, जिसे वे कहते हैं राज्य का दूसरे दर्जे का नागरिक शासित बने रहना पड़ेगा, और उनकी सत्ता में कोई भागीदारी नहीं हो सकती है। जब मैंने उनसे पूछा, ‘‘क्या आप मानते हैं कि तानाशाही लोगों पर शासन करने का अच्छा तरीका है।’’ तब वे कहेंगे, ‘‘नहीं! हम तानाशाही पसंद नहीं करते।’’ तब हम पूछेंगे, ‘‘फिर आप इसकी इजाजत क्यों देते हैं?’’ लेकिन वे कहते हैं, ‘‘यह अंतरिम काल है जिसमें तानाशाही का होना जरूरी है।’’ आप आगे बढ़ते और पूछते हैं, ‘‘आपके इस अंतरिम काल की अवधि क्या है? कितना लंबा चलेगा यह काल? बीस साल? चालीस साल? पचास साल?’’ कोई उत्तर नहीं। वे बस यह दोहराते रहते हैं कि सर्वहारा की तानाशाही किसी तरह से अपने आप गायब हो जाएगी।

‘‘ठीक है हम मान लेते हैं कि तानाशाही समाप्त हो जाएगी? फिर इसका स्थान कौन लेगा? क्या लोगों को किसी न किसी तरह की सरकार की जरूरत नहीं होगी।’’ इसका उनके पास कोई उत्तर नहीं होता। हम बुद्ध पर फिर वापस लौटते हैं