531
में लेखक दूसरा धर्म अपनाने को मजबूर होगा, क्योंकि उस धर्म के प्रतिनिधियों की और सहायता का प्रस्ताव किया गया है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि ये धमकियां मजबूत हैं और उनके लिए चिंता का विषय है जो अपने पुरखों के धर्म का जरा खयाल करते हैं। लेकिन जो लोग हिंदूवाद से, या इस मायने में किसी भी धर्म से अपनी आस्था खो चुके हैं, उनके साथ समझौता करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं। धर्म लेन-देन का मामला नहीं। यह तो व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह किस धर्म का होकर रहना चाहता है। वह उसको किसी भी आकार या रूप में नहीं खरीदता। या इस प्रकार की अभिव्यक्ति का प्रयोग आत्मा की वस्तुओं के संबंध में किया जा सकता है, तो धर्म केवल अपने रक्त से खरीदा जा सकता है। अतः यदि कोई हरिजन हिंदू धर्म को छोड़ना चाहता है तो वह ऐसा करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है।
‘‘सुधारक को अपना हृदय टटोलने की जरूरत है। धर्म छोड़ने का कारण क्या उसका अपना या उसके पड़ोसियों का व्यवहार है? अगर यह है, और अगर अनुचित पाया जाता है तो उसे (व्यवहार को) बदलना चाहिए।
यह एक स्वीकृत तथ्य है कि अपने आपको सनातनी कहलाने वाले बहुत अधिक हिंदुओं का व्यवहार सारे भारत में हरिजनों के लिए परेशानी और उत्तेजना का कारण है। आश्चर्य यह है जितने हरिजनों ने हिंदू धर्म छोड़ दिया है, उससे कहीं ज्यादा ने क्यों नहीं छोड़ा है? इससे पता लगता है कि हिंदू धर्म के प्रति या इसके अंतर्निहित गुणों के प्रति उनकी निष्ठा का, कि उसी धर्म का नाम पर समानवीयताएं झेलने के बावजूद दसियों लाख हरिजन उसी से चिपके हुए है।
हरिजनों की यह अद्भुत निष्ठा और उनका असाधरण धैर्य प्रत्येक सवर्ण हिंदू के लिए यह देखना आवश्यक बनता है कि हरिजनों के साथ वही व्यवहार होता है जो अन्य हिंदुओं के साथ होता है। इसलिए सवर्णों के सामने रास्ता एक ओर तो यह है कि जो हरिजन हिंदू धर्म को छोड़कर जाना चाहते हैं उनको नौकरी या वजीफे की शक्ल में रिश्वत देने की पेशकश करके जाने से रोकने की कोशिश करें, और दूसरी ओर इस बात पर जोर दें कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हरिजनों के साथ न्याय किया जाता है। वास्तव में सुधारक को हरिजनों की आवश्यकताओं को पहले से समझना चाहिए और उनकी शिकायत तक इंतजार नहीं करना चाहिए। छुआछूत मिटाने के लिए सबसे बड़ी संस्था हरिजन सेवक संघ है। यह यथासंभव हरिजनों को नौकरी देता है। हरिजन जिन नौकरियों के उपयुक्त हैं और जिनके लिए वे अपने को प्रस्तुत करते हैं, आमतौर पर ऐसी नौकरियों की कोई कमी नहीं है।