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III
परिशिष्ट -
‘‘खरी खरी बात‘‘
22 सितंबर, 1944 की शाम को डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नागरिक अभिनंदन कर मद्रास ने स्वयं को गौरवान्वित किया है। डॉ. अम्बेडकर एक विशाल समुदाय के सर्वमान्य नेता हैं जिसको सदियों से सामान्य नागरिक के अधिकारों से वंचित रखा गया है। अपनी उच्च उपलब्धियों, अपने साहसी नेतृत्व और असाधारण गुणों से उन्होंने स्वयं को एक ऐसा नेता प्रमाणित कर दिया है, छोटे-छोटे मामलों पर मतभेदों के बावजूद हर किसी के द्वारा सम्मान किए जाने योग्य है। अतः यह खेद का विषय है कि ऐसे व्यक्ति के नागरिक अभिनंदन का विरोध एक राजनीतिक पार्टी-कांग्रेस पार्टी द्वारा किया जा रहा है और कि इसके सदस्य समारोह में शामिल नहीं हुए हैं। परंतु यह रूख न तो नया है और न ही आश्चर्यजनक। जो पार्टी हमेशा से सर्वसत्तावादी तरीकों से निदेशित रही है और जिसने कभी भी सार्वजनिक जीवन तथा सार्वजनिक आचरण में शिष्टाचार का प्रदर्शन किया है, उससे यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि वो अन्य राजनीतिक विचारधारा के नेताओं के प्रति अपना बैर-भाव दिखाने का कोई अवसर चूकेगी। परंतु हम महसूस करते हैं कि डॉ. अम्बेडकर का नागरिक अभिनंदन उस मायने में और भी अधिक अर्थपूर्ण था जिसमें इसका आयोजन किया गया था क्योंकि इसका आयोजन किया गया था क्योंकि यह सभ्यता की परंपरागत लीक से हटकर था। अभिनंदन के उत्तर में डॉ. अम्बेडकर सरलता के साथ बोले और अपने विचार व्यक्त किए जिनसे हमारे देशवासियों का बड़ा हिस्सा सहमत है। एक ऐसे समय में जब राजनीतिक सुधारों की योजना पर विचार हो रहा है, और जब स्वाधीनता के लक्ष्य पर जोर दिया जा रहा है, तब ऐसे विभन्न कारणों का सही मूल्यांकन करना है जिन पर ध्यान रखना चाहिए। अतः इन परिस्थितियों में यह स्वाभाविक ही है कि अतीत के सबको, खासतौर पर निकट अतीत के सबको भुलाया नहीं जाए। इन सबको का उल्लेख करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने विचार व्यक्त किया, ‘‘इस देश में चाहे उन्होंने कुछ भी किया हो, शासक समुदाय हमेशा ब्राहा्रण रहे हैं। ऊपर केवल वे आए हैं, और कोई नहीं। सात प्रांतों में ब्राहा्रण प्रधानमंत्री (या मुख्यमंत्री)? ब्राहा्रण थे और मंत्रिमंडल में ब्राहा्रणों की संख्या आधी थी। चुनावों ने यह सिद्ध कर दिया है कि इस देश में शासक वर्ग बनना केवल एक समुदाय के भाग्य में है और वो शासक वर्ग के रूप में सामने आया है। हमारे पाठकों को यह नोट करना दिलचस्प होगा कि मंत्रिमंडल में फेरबदल होने के समय प्रधानमंत्री के तौर पर केवल ब्राहा्रण को ही चुना गया था और इस प्रकार यह परंपरा कायम कर दी