540 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गई थी कि समर्थ का वारिस केवल समर्थ ही होना चाहिए। यह सुनिश्चित करने पर बढि़या तरीका कांग्रेस संसदीय दल का गठन या कि सत्ता और नियंत्रण सदा सम्मानित शासक वर्ग के पास ही रहे। उम्मीदवार के चुनाव में अंतिम निर्णय प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों का नहीं, बल्कि संसदीय दल के अध्यक्ष का था। इस मामले में प्रांतीय कमेटियों के अध्यक्षों का भी कोई दखल नहीं था, बल्कि इन सिफारिशों पर ससंदीय दल की अंतिम स्वीकृति प्राप्त करने का काम कांग्रेस के श्री राजगोपालाचारी जैसे सदस्यों के जिम्मे था। इन परिस्थितियों में इसमें आश्चर्य की क्या बात कि उन गैर-ब्राहा्रणों के लिए उम्मीदवार के तौर पर नामजद किए जाने तक की कोई संभावना नहीं जो किसी न किसी हद तक स्वतंत्र थे और अपने आपको दब्बू तथा आज्ञाकारी सिद्ध नहीं कर सकते थे। इन हालात में क्या हमारे किसी भी देशवासी को इस पर कोई आश्चर्य होगा कि डॉ. रामलिंगा रेड्डी जैसे व्यक्ति को जो पिछली विधानसभा में कांग्रेस विरोध पक्ष के नेता थे, चुना नहीं गया और उनको ठंडे बक्से में डाल दिया जबकि सैंकड़ों अचानक मशहूर हो गए और उम्मीदवार चुन लिए गए अभी तक जिनके नाम और ख्याति कांग्रेस के अभिलेखागार में दबे पड़े थे?
सत्ता के लिए उम्मीदवारों का चुनाव तक संसदीय बोर्डों में केंद्रित था। अतः कोई आश्चर्य की बात नहीं कि मुख्यमंत्रियों को चुनने का काम पूरे तौर पर थोड़े-से लोगों पर छोड़ दिया गया था। स्वाभाविक रूप से सभी मुख्यमंत्री ब्राहा्रण थे। श्री राजगोपालचारी, श्री खेर, पंडित पंत, श्री बार्दोलाई, पंडित शुक्ला इत्यादि जैसे सभी महाचुनाव चयनित जाति के ही होते थे, और अपनी ओर से उन्होंने यह ध्यान रखा कि उनके मंत्रिमंडल के कम से कम आधे सदस्य शासक नस्ल के सदस्य हों। आप मताधिकार का चाहे कितना विस्तार कर लें, आप वयस्क मताधिकार दे सकते हैं, लेकिन ऊपर केवल शासक नस्ल के लोग ही आएंगे। मंत्रिमंडलों से न केवल पचास प्रतिशत ब्राहा्रण थे, बल्कि प्रतिष्ठा और अधिकार के प्रायः महत्वपूर्ण मंत्रालय उन्हीं के हाथों में उनके नियंत्रण में रहने चाहिए। अतः यदि अपनी ही प्रेसीडेंसी को देखा जाए तो पुलिस, सार्वजनिक सेवाएं, राजस्व, औषधि एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य, उद्योग, धार्मिक स्थायी निधि-वास्तव महत्व की ब्राहा्रण उनके नियंत्रण में रहनी चाहिए। उसके ऊपर और अतिरिक्त झूठन के तौर पर जो कुछ विभाग गैर-ब्राह्मणों मुस्लिमों या दलित वर्ग के मंत्रियों के दिए गए थे, उन पर भी मुख्यमंत्री का नियंत्रण और निर्देश होना चाहिए और उसका आदेश चलना चाहिए। जिस कार्यविधि के द्वारा पूरी सत्ता प्रभावशाली ढंग से छोटे समुदाय के प्रतिनिधियों में केंद्रित की गई थी, उसको अन्य छह प्रांतों में भी, और वो भी एक बार फिर सरकार के जनतांत्रिक रूप की आड़ में लागू किया गया था-पेशवाओं के उत्तराधिकारियों का बुद्धिमतापूर्ण नियम