परिशिष्ट-III खरी खरी बात। - Page 562

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जारी रखा गया। इस नीति का अनिवार्य परिणाम यह हुआ कि अन्य राष्ट्रीयताओं की दासता जारी रही और ब्रिटिश प्रशासकों तथा गवर्नरों की मदद से सत्ता और अधिकार का बेलगाम इस्तेमाल होता रहा जिसका मकसद ऐसे तत्वों को दबाना था जो विरोध की अपनी कमजोर आवाजों को उठाने की हिम्मद कर सकते हों। इस प्रेसीडेंसी में इन तथाकथित हिंदी आंदोलनकारियों को दबाने केंद्रीय प्रदेशों और बंबई में विद्यामंदिर स्थापित करने के लिए बहुत बदनाम फौजदारी कानून, संशोधन अधिनियम का प्रयोग जनतंत्र की प्रकृति का एक स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, जिसकी आशा भी की जानी चाहिए।

इसलिए डॉ. अम्बेडकर ने जो चेतावनी दी है वो सामयिक और आवश्यक है, ‘‘हमें यह प्रश्न करना चाहिए’’ वह कहते हैं, ‘‘क्या किसी देश विशेष के शासक वर्ग में उत्तरदायित्व की कोई भावना है जिसमें कि उस देश की सरकार को उसके हवाले किया जा सके। हम सब यह तथ्य भूल चुके हैं कि शासन करने के अधिकार का निर्धारण शासक वर्ग के उत्तरादायित्व की भावना के प्रकाश में किया जाना चाहिए। शासक वर्ग का दृष्टिकोण क्या है? उसका दर्शन क्या है? वो किसमें विश्वास करता है?’’ इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए डॉ. अम्बेडकर उचित ही कहते हैं, ‘‘अगर आपका शासक वर्ग श्रेणीगत असमानता में विश्वास करता है, अगर वह उसमें विश्वास करता है कि आपको किसी अन्य मनुष्य को नहीं छूना चाहिए, अगर वो विश्वास करता है कि शिक्षा पाने का अधिकार केवल किसी एक वर्ग को है, दूसरे को नहीं, अगर वो विश्वास करता है कि संपत्ति का अधिकार केवल एक वर्ग को है और दूसरा वर्ग केवल गुलामी करने और गुलामी में मरने को पैदा हुआ है, ऐसे में यदि कोई राष्ट्रीय सरकार बनती है और ऐसे हाथों में जाती है तो क्या आप सोचते है कि ऐसी राष्ट्रीय सरकार वर्तमान भारत सरकार से बेहतर होगी? ये संदेह किसी भी तरह से काल्पनिक नहीं है। दूसरी ओर वे अतीत के कड़वे अनुभवों और वर्तमान की आशंकाओं पर आधारित है। इस सच को छुपाने का कोई लाभ नहीं कि शासक वर्ग की सामान्यजन से कोई दिलचस्पी नहीं और यदि है भी तो बहुत कम। महान डाथोस के शब्दों में उनके वक्ता बर्क या कोबडेन की तरह भाषण झाड़ सकते हैं, लेकिन उनके काम उनकी बातों की कलई उतार देते हैं। शिक्षा में उनकी दिलचस्पी अपने समुदायों को सुविधाएं दिलाने तक सीमित है। नौकरियों के लिए उनका संघर्ष तभी जोरदार होगा जब उनका लाभ उनके नाते-रिश्तेदारों को पहुंचाता हो। स्व-शासन के पक्ष में उनके सबसे शक्तिशाली तब तक ही होंगे जब तक इससे उनके लोगों को सत्ता में बने रहने में सहायता मिलती है। अगर इस प्रकार की सफलता की कोई संभावना नहीं होती वे कलाबाजी करेंगे और धारा-93 को लागू करने को कहेंगे।