38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मिल जाती है। तीसरे, इससे सभा का प्रबन्धन आसान होगा। अब अवगुणों के सम्बन्ध में कहना उचित होगा कि इस प्रणाली से लोगों तथा सरकार के रिश्ते के बंधन पर कमज़ोर होने का प्रभाव पड़ेगा और मैं विश्वास से कह सकता हूँ कि देश के उत्थान से जुड़ी बातों का जनता की दृष्टि से ओझल रखने का प्रभाव राष्ट्रीय एकता की भावना की गति में भी अवरोध उत्पन्न करेगा। परन्तु साइमन आयोग की प्रस्तावित प्रणाली के प्रभावों में परिणामों या दुष्परिणामों में से चाहे कोई भी पलड़ा भारी हो, यह प्रणाली केन्द्रीय विधायिका गठन में लागू होगी ही। प्रश्न केवल यह है कि यह प्रणाली कहाँ के लिए ज्यादा उपयुक्त होगी विधान सभा या राज्य सभा के लिए? यह तो जग जाहिर है कि दोनों में तो यह लागू हो ही नहीं सकती क्योंकि परोक्ष निर्वाचन की सबसे बड़ी कमी/कमज़ोरी ही यह है कि ‘‘काठ की हंडिया’’ की तरह एक बार प्रयोग में ही समाप्त हो जाती है। निणार्यक केवल एक बार ही मतदाता से दूरी बनाते हुए प्रतिनिधि चुनाव में सत्यता दर्शा सकता है। अगर मतदाता से दूसरी बार निर्मित दूरी रखते हुए निर्वाचक प्रतिनिधि मनोनीत करें तो सत्यता तथा विश्वसनीयता दोनों नष्ट हो जाती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर देश विधान सभा तथा राज्य सभा दोनों सदनों को रखने का निर्णय लेता है और हम लोक सभा तथा विधायिकाओं में यह प्रणाली प्रयोग में लाते हैं तो राज्य सभा निर्वाचन में हमारे पास स्रोत नहीं बचेंगे। अभी तो राज्य परिषद एक बुरी विसंगति है और अगर विधि रचना में इसे अपना दायित्व निभाना है तो भारत सरकार में इसे इसके वर्तमान स्वरूप में रहने नहीं दिया जा सकता। अगर मैं अपनी सोच में सही हूँ तो विधान परिषद के चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली के तहत तथा परोक्ष प्रणाली के तहत राज्य परिषद का निर्वाचन करना सर्वोत्तम उपाय लगते हैं। केंद्रीय परिषद के गठन के लिए अंततः किस आधार पर कौन सा उपाय चुना जाता है। दलित वर्ग के प्रतिनिधित्व चुनने के लिए परोक्ष चुनाव ही सबसे आसान प्रक्रिया है चाहे वो किसी भी सदन के लिए हो। इस परिणाम पर हमें कोई भी विलाप नहीं करना। क्योंकि पहले से ही चल रही मनोनयन व्यवस्था की तुलना में इससे पर्याप्त सुधार होगा।
- प्रांतीय परिषद जो अभी गठित हैं, में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। 1919 की साउथ बोरो समिति ने इस विषय में दलितों के साथ बड़ा अन्याय किया और भारत सरकार ने भी इस दयनीय निर्धारित अंश में वृद्धि करने की सिफ़ारिश की थी। पर यह अन्याय की स्थिति वैसी की वैसी ही बनी रही।