5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 60

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सन् 1923 की मुद्दीमन समिति ने इस बारे में टिप्पणी की कि परिषदों में

दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नाममात्र ही है और सुझाव दिया कि बड़े

पैमाने पर इसमें बढ़ोतरी की जानी चाहिए। परन्तु कहीं कहीं कोई एक या दो

प्रतिनिधि और जोड़ने के अतिरिक्त शिकायत दूर करने के लिए कोई कदम

नहीं उठाये गये। दलित वर्ग की कमजोर स्थिति के कारण उन्हें सरकारी

दफ्तरों से सहारा लेने को कहा गया। अनुभव ने हमें सिखाया है कि सरकारी

कर्मचारी हमारे या किसी के भी साथी नहीं है बल्कि यह तो अपने आप के

ही मित्र हैं और उनकी दोस्ती उनके स्वार्थ-साधन से ही जुड़ी होती है। मुझे

यह कहते हुए खेद हो रहा है कि गत दस वर्षों में सरकारी कर्मचारियों ने

जितना दलित वर्ग को दिया है उससे कहीं ज्यादा इन्होंने पाया है। जैसा

भी हो, अब दलित वर्ग को यह संदेहपूर्ण लाभ भविष्य में भारत के संविधान

के अंतर्गत सरकारी कर्मचारी से मिलने वाला नहीं है तो क्या यह न्यायसंगत

नहीं होगा कि दलित वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाये जैसा कि हर

अल्पसंख्यक वर्ग को दिया जा रहा है? साइमन आयोग राज्य सभाओं में दलित

वर्ग को कितना प्रतिनिधित्व देने को राजी है? उन्होंने कहा है कि, ‘‘दलित

वर्ग आरक्षित स्थानों का भारत की सामान्य वर्ग के अर्न्तगत कुल स्थानों का

अनुपात दलित वर्ग की जनसंख्या तथा निर्वाचन क्षेत्र की कुल जनसंख्या के

अनुपात का तीन चौथाई यानि 75 प्रतिशत होगा’’। अब साइमन आयोग ने

भारत के अल्पसंख्यकों को क्या दिया, इसका अवलोकन करें।

कांग्रेस के कड़े विरोध को अनदेखा करते हुए मुसलमान अल्पसंख्यकों को लखनऊ समझौते के अंतर्गत उन्हें प्राप्त अपनी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक प्रतिनिधित्व की आज्ञा को वैसी की वैसी बना रहने दिया गया। भारतीय ईसाई, आंगल भारतीयों व यूरोपियनों को आयोग ने उनकी जनसंख्या के अनुपात से कहीं अधिक अधिमानी सुविधा दी है। क्या यह एक कलंकपूर्ण अपवाद नहीं है? क्या बाधाओं से घिरे इस समाज के प्रति दयाभाव दिखाना तो दूर वे न्यायोचित भाग पाने के हकदार भी नहीं हैं? यहां तक कि भारतीय केन्द्रीय समिति ने भी दलित वर्ग को उनकी जनसंख्या के अनुपात से प्रतिनिधित्व देने की सिफारिश की है और अगर यह स्वीकार कर लिया जाता है तो हमें कम से कम हर अल्पसंख्यक के बराबर तो मिलेगा।

  1. केंद्रीय परिषद के द्वार दलित वर्ग के लिए आरम्भ से ही बन्द रहे हैं और

1921 में जब लोकप्रियता के आधार पर नये नियम बनाए गए तब भी ये

दलित वर्ग के लिए बन्द ही रहे। 1926 ई. तक दलित वर्ग के लिए कुछ भी

नहीं हुआ। जब 150 सदस्यों वाली विधान सभा में दलित वर्ग को एक सदस्य