5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 61

40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चुने जाने का अधिकार देकर उन पर एक अहसान किया गया। राज्य सभा के द्वार उनके लिए अभी भी बन्द हैं। साइमन आयोग ने दलित वर्ग के लिए केंद्रीय परिषद में कुछ सीटों के लिए प्रावधान बनाकर एक प्रयास किया है। परन्तु ये प्रावधान केवल विधान सभा के बारे हैं और राज्यसभा के लिए लागू नहीं होते । जहां मैं उनके द्वारा दर्शाई दयालुता के लिए उनका कृतज्ञ हूं, वहीं मैं उनके इस कंजूसी की शिकायत करता हूं। आपको याद होगा कि लगभग उस समय जब साइमन आयोग की नियुक्ति हुई थी, दलित वर्ग की गणना का लेखा जोखा जिसमें सभी लोगों तथा सरकार ने दावा किया था कि जनगणना में पाई दलित वर्ग की संख्या वास्तविक जनसंख्या से अधिक है। साइमन आयोग के द्वारा अंकित न्यूनतम दलित वर्ग जनसंख्या ब्रिटिश भारत की जनसंख्या की 20 प्रतिशत पाई गई। परन्तु साइमन आयोग द्वारा सुझाए प्रावधान दलित वर्ग की विधान सभा में प्रतिनिधित्व 8 प्रतिशत तक है व राज्य सभा में प्रतिनिधित्व की कोई बात ही नहीं।

  1. मैं साइमन आयोग द्वारा अपने दावों तथा आवश्यकताओं को इस व्यवस्थित ढंग से अवमूल्यन की बात को नहीं समझ पा रहा हूँ। हम सब आशावान थे कि साइमन आयोग केवल दलितों को न्याय ही नहीं देंगे बल्कि दयालुता दिखाकर कुछ ज्यादा ही देंगे। ऐसी दयालुता दिखाने के कारणों की भी कोई कमी नहीं थी। यह बात मेरी समझ से परे है कि कोई समुदाय अपनी राजभक्ति के बल पर संविधान बनने के समय कुछ विशेष अधिकार अपने लिए कैसे प्राप्त कर सकता है ? परन्तु जहां तक राजभक्ति द्वारा भारत में कुछ राजनीतिक विशेष अधिकार खरीदने का प्रश्न है दलित वर्ग की राजभक्ति तो असीमित थी। वे केवल सिद्धान्तों के लिए ही अंग्रेजो से प्रेम नहीं करते थे बल्कि उनके प्रति आसक्त थी। दलित वर्ग के विशिष्ट अधिकार की मांग का जोरदार दावा तो दलित वर्ग की बहुत ही अधम हालत से जुड़ा था। भारत का कोई भी अल्पसंख्यक वर्ग इतना पद दलित नहीं है जितना कि यह दलित वर्ग और उस पर बिल्कुल निसहाय। उनके दुःख असाधारण हैं व इतने हैं कि ये ही शायद भारत को ‘स्वशासन के अयोग्य’ करार देने के लिए पर्याप्त थे। निस्संदेह एक समुदाय जिस पर समाज ने अत्याचार कर

खूब पाप अर्जित किये हों उस समुदाय (दलित वर्ग) को निष्कपटतापूर्ण, उदारतापूर्ण व्यवहार पाने का हक था। दलित वर्ग को साइमन आयोग के हाथों उदारता तो मिली ही नहीं, बल्कि उनको तो न्याय मात्र भी नहीं मिला। कोई यह प्रश्न पूछ सकता है कि लार्ड बिर्कहैड के भावुक विचार