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जो उन्होंने साइमन आयोग की नियुक्ति के समय संसद में प्रस्ताव लाने
के समय व्यक्त किये, का क्या हश्र हुआ ? उस समय दलित वर्ग ने एक
विशेष ट्रस्ट बनाया और ब्रिटिश लोग दलित वर्ग के संरक्षण के प्रावधान
बनाये बिना इस ट्रस्ट को किसी और को सौंप कर नहीं जा सकते थे। क्या
हम यह मानें कि साइमन आयोग की सिफारिशों के साथ शब्दाडम्बर की
भावना की भरपाई हो गई? मित्रो, हमें सावधान रहना होगा कि लोग हमारे
साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं। मुझे डर है कि ब्रिटिश जानबूझकर हमारे
दुर्भाग्यशाली हालात का प्रचार करते हैं इसलिए नहीं कि वे हमारी स्थिति
सुधारने के बड़े इच्छुक हैं बल्कि यह सब वे इसलिए करते हैं कि इससे
उन्हें भारत की राजनीतिक प्रगति को धीमा करने का एक बहाना मिलता है।
मेरी धारणा है कि हमारे नेता इस बात की बहुत कम चिंता करें कि ब्रिटिश
ने अभी तक हमारे लिए क्या किया और यह चिंता ज्यादा करें कि भविष्य
में हमारे साथ क्या हो सकता है और बिना किसी भय के अपनी जीवनचर्या
का निर्धारण सुनिश्चित करें। अगर उदारतापूर्ण व्यवहार नहीं मिलता तो
कम से कम न्याय मांगने की दुहाई अवश्य लगाते रहें क्योंकि हमारी विशेष
परिस्थितियों के कारण हम यह मांगने के हकदार अवश्य हैं।
- मेरे विचार में स्वशासित भारत के भविष्य के संविधान में दलित वर्ग के
लिए आवश्यक गांरटियां तथा संरक्षण प्रावधानों के बारे मैंने सब कुछ कह
दिया है। परन्तु इस बैठक में जिन सभी विषयों पर चर्चा होनी चाहिए अभी
समाप्त नहीं हुए। अगर हम देश में चल रहे राजनीतिक आन्दोलन पर अपने
विचार रख एक धारणा न बनाएं तो यह सभा अधूरी ही रह जाएगी। आपको
याद होगा कि कलकत्ता में दिसम्बर 1928 के अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय
कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर घोषणा की थी कि दिसम्बर 1929 तक ‘ब्रिटिश
प्रभुता की भारत सरकार’ की स्थापना करे नहीं तो हमारी मांग प्रभुता की
सरकार से बदलकर पूर्ण स्वतंत्रता मांगने की हो जाने की धमकी की थी।
इस धमकी के उत्तर में ब्रिटिश प्रभुता की सरकार की स्थापना करना उनका
लक्ष्य है। कांग्रेस इस घोषणा से संतुष्ट नहीं हुई। कांग्रेस ने ब्रिटिश प्रभुता
की सरकार लक्ष्य वाली बात को नकारते हुए कहा कि उन्होंने उस दिन
तक प्रभुता सरकार की स्थापना मांगी थी तथा दिसम्बर 1929 की सभा में
’’भारत को स्वतंत्रता’’ की मांग का लक्ष्य घोषित किया। आपको यह घोषणा