5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 64

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  1. यह सब सत्य है। परन्तु प्रश्न है कि हमने इसका क्या मूल्य चुकाया ? इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारतीय वंश को बौना दिखाने का काम ब्रिटिश सरकार के राज में हो रहा है। श्रीमान स्वर्गीय गोखले के शब्दों में, ‘‘अपने जीवन के प्रत्येक दिन हमें बाधित किया जिता है कि हम तुच्छता का अनुभव करें और हममें से जिन का कद बड़ा है उन्हें झुकने को मजबूर किया जाता है। कोई भी भारतीय होने का गर्व अनुभव नहीं कर सकता जो एक स्वशासित देश के नागरिकों के लिए ऊपर उठने का एक स्रेत होता है। आप ‘‘स्वराज’’ की मांग के साथ जुड़े नैतिक कारणों से शायद ज्यादा प्रभावित न हों और जब एक रईस के मुंह से ‘‘स्वराज’’ की मांग के साथ जुड़े नैतिक कारणों से शायद ज्यादा का व्याख्यान सुनें तो आप मन ही मन मुस्करायें क्योंकि शायद कहीं यह आपको एक शैतान धार्मिक पुस्तकों को पढ़कर सुनाने जैसी एक ढांगपूर्ण याद को ताजा कराता हो। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्रिटिश सरकार का भारी मूल्य जनता में से हर किसी को चुकाना पड़ रहा है। यह विश्व की सबसे मंहगी सरकार है। आप शायद इस कथन से सहमत न हां क्योंकि इस देश में विधि तथा अनुशासन बनाये रखने के लिए कितनी भी कीमत कम नहीं है। परन्तु लोगां की निर्धनता की बात तो तुम्हें जरूर जंचेगी। क्या विश्व में कोई ऐसा भी देश है जहां की जनसंख्या इतनी निर्धन हो जितनी भारतीय जनता? 19वीं शताब्दी के पहले चतुर्थांश में पड़े अकालों में लगभग 10 लाख जानों का नुकसान हुआ। ऐसे ही दुसरे, तीसरे तथा आखिरी 19वीं शताब्दी के चतुर्थांश में भी अकालों से अनुमानित पीडि़तों की मृत्यु संख्या क्रमषः 4 लाख, 50 लाख व 1.5 करोड़ से 2.6 करोड़ रही। इसमें उन बेकारों की गिनती नहीं है जो एक साल में ही 60 लाख के ऊपर थे वह, जिन्हें ‘‘बेकारों को सरकारी भत्ते’’ के नाम पर मुट्ठी-मुट्ठी भर अनाज देकर जीवित रखा गया था। मित्रो, इस सबका क्या कारण था? साधारण भाषा में यह इस देश की सरकार की इच्छा तथा सोची समझी नीति के अनुसार था। ब्रिटिश सरकार का सदा ही उद्देश्य इस देश के व्यापार तथा उद्योग की बढ़त को हतोत्साहित करना रहा है। यह महज अनुमान के आधार पर किया एक दोषारोपण नहीं है। यह ब्रिटिश सरकार का एक सर्वस्वीकृत सिद्धान्त रहा है कि भारत पर शासन ऐसे किया जाए कि ब्रिटिश सामान के लिए भारत एक खुला बाजार बना रहे। इस नीति के परिपालन ने ही भारत को एक स्थायी गरीब देश बनाकर छोड़ दिया है। भारतीयों में इस क्रमशः बढ़ती गरीबी में वे लोग कौन हैं जो सबसे अधिक पिसते हैं? मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि कृषि से जुड़ी जनसंख्या में से वे आधे जो साल में से छः महीने कभी भर पेट भोजन नहीं