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को समझती है जो इस समाज को दीमक की तरह खोखला किए दे रही हैं? क्या भारत सरकार उस जनता के बारे में चिंतित नहीं है जिसको ये पूंजीपति चूस-चूस कर सुखा रहे हैं? क्या भारत सरकार उन गरीब मज़दूरों के प्रति अपना दायित्व नहीं समझती जिनको पूंजीपति न तो उचित मजदूरी देते हैं और न ही काम करने का सही वातावरण? सरकार यह अनुभव तो करती है फिर भी इसने कभी इन बुराइयों को दूर करने का साहस नहीं किया। आखिर क्यों? क्या इसके पास इसको रोकने की पर्याप्त शक्ति नहीं है? नहीं। सरकार को भय है कि अगर उसने वर्तमान सामाजिक तथा आर्थिक जीवन संहिता को संशोधित करने हेतु हस्तक्षेप किया तो उसका विरोध होगा। यही हस्तक्षेप न करने का कारण है ऐसी सरकार किसी का क्या भला कर सकती है? ऊपर बताई दो बाधाओं से डरी सरकार एक पक्षाघात के रोगी के समान लोगों की भलाई के काम भी रोके रखती है। हमारी सरकार ऐसी होनी चाहिए जिसमें महत्वपूर्ण कार्यों के लिए देश को समर्पित लोग हों। उत्तरदायित्व वाले पद पर ऐसे लोग हों जो समझें कि आज्ञा पालन की सीमा कहां है तथा विरोध कहां से आरम्भ होगा। उन्हें सामाजिक तथा आर्थिक जीवन संहिता को संशोधित करने से भय नहीं लगता क्यांकि यह न्याय और समय की मांग उन्हें प्रेरणा प्रदान करती है। ब्रिटिश सरकार यह भूमिका कभी न निभा पायेगी। यह कृत्य तो ‘‘लोगां की, लोगों द्वारा’’ व लोगों के लिए बनी सरकार अर्थात ‘‘स्वराज सरकार’’ द्वारा ही संभव है।
- अब इस प्रश्न को निजी स्वार्थ के दृष्टिकोण से देखें। गोरों के आगमन से पहले आप घृणित छुआछूत की परिस्थितियों में थे। क्या ब्रिटिश सरकार ने छुआछूत से छुटकारे के लिए कुछ किया? ब्रिटिश से पहले आप कुएं से पानी नहीं खींच सकते थे। क्या ब्रिटिश सरकार ने कुएं का अधिकार तुम्हें दिलाया? ब्रिटिश से पहले आप मंदिर में नहीं घुस सकते थे। क्या तुम अब घुस सकते हो? ब्रिटिश से पहले तुम्हारे लिये पुलिस में भर्ती होने पर रोक थी। ब्रिटिश से पहले तुम्हें सेना में सेवा करने की अनुमति नहीं थी। क्या वह जीवनचर्या का मार्ग अब तुम्हारे लिए खुला है? सज्जनो, इन प्रश्नों में से किसी का भी उत्तर हाँ नहीं है। वे जिनके पास देश के नियंत्रण के लिए इतनी बड़ी शक्ति थी तथा जिन्होंने देश पर इतने लम्बे समय तक शासन किया उन पर कुछ अच्छा करने का दायित्व बनता था। परन्तु आपकी स्थिति में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया। जहां तक तुम्हारा प्रश्न है कि ब्रिटिश सरकार ने जो व्यवस्था पहले से बनी थी उसे ही स्वीकार किया और उन व्यवस्थाओं को