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हममें से वे जो कांग्रेस की सेवा करने के बारे में चिंतित हैं, इस बात को लेकर विश्वस्त हैं कि स्वराज मिलने के बाद कांग्रेस हमारी सेवा से प्रसन्न होकर पुरस्कार में हमारे छुआछूत को मिटा देगी। अगर हम अभी उसकी सेवा नहीं करते हैं तो कांग्रेस पार्टी हमारे इस दोष के लिए हमसे अपराधियों वाला व्यवहार करेगी। मैं तो केवल इतना कहूंगा कि अनुग्राहक सेवाओं का पुरस्कार विरले को ही मिला करता है। परन्तु मैं यह कहने के लिये उतावला हूं कि चाहे जो जितनी कांग्रेस की सेवा कर ले पर स्वराज मिलने के बाद कांग्रेस को ढूंढते रह जाओगे। तब हमें अपने ही साधनों पर निर्भर होना होगा, क्योंकि तब कांग्रेस स्वराज के रूप में अपना लक्ष्य प्राप्त कर दृश्य से गायब हो चुकी होगी, और हैमिल्टन के शब्दों का प्रयोग करते हुए ‘‘हमारा सामना उस समय देश के महान क्रूर जंगली मनुष्य से होगा जो उस समय पूर्णतया मदमस्त होगा।’’ मुझे भ्रम है कि वह महात्मा गाँधी, जिसके भरोसे हमें अपनी सारी पीड़ा भूलने तथा उनका अंत करने के लिए कहा जाता है, भी उस समय हमारी सहायता करने में असमर्थ होंगे, यह मानते हुए भी कि वह उस समय तक जीवित बचे रहेंगे क्योंकि प्रकति नश्वर मानव को क्षमा नहीं करती।
अगर मेरी सोच ठीक राह पर है तो हमें अपना इतिहास स्वयं रचना चाहिए। हममें से वे जो ऐसा कुछ भी करने से आशंकित है मैं उन्हें समझ रहा हूँ। वे कांग्रेस तथा सरकार दोनों से ही स्वतंत्र होने में हानि के डर से भयभीत हैं। यह हमारी निर्बलता की स्वीकारोक्ति है और मैं इस बात से सहमत हूँ कि स्वतंत्र होने के बाद अगर दलित वर्ग की गिनती शक्ति वालों के साथ नहीं होती तो यह एक चिंतनीय विषय है। लेकिन मैं यह पूछता हूँ कि कांग्रेस या सरकार पर निर्भर रहने का क्या लाभ है? व्यावहारिकता में, आपकी मनोवृत्ति एक अधिक शक्तिशाली पार्टी की नजरों में भले बने रहने के खातिर उससे संबंध जोड़े रखने की मानसिकता को भिक्षावृति या शर्मनाक आत्मसमर्पण से ज्यादा कुछ नहीं कहलाएगी। दलित वर्ग के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है कि वे कैसे एक ऐसी शक्ति बनकर उभरें कि, उनके दृष्टिकोण तथा विचार सभी अवसरों पर बाकी सभी वर्गों के विचारों से अधिक महत्वशील हों। मुझे दलित आन्दोलन में दो कमियां लगती हैं। पहली तो यह कि दलित वर्ग की एकमत जैसी कोई धारणा नहीं है तथा दूसरी दलित वर्ग का एकजुट होकर कार्य प्राप्ति के लिए किसी भी साधन या उपाय का न होना। मुझे लगता है कि काफी समय से हम गूंगे बने हुए हैं तथा अपनी व्यथाएं बिना किसी चर्चा के झेलते रहे हैं। यही एक बड़ा कारण है कि हमारी समस्याओं का समाधान