5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 75

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं हुआ। हम औचित्य से अपनी दुर्व्यवस्था के लिए सरकार या सुधारकों को दोषी नहीं ठहरा सकते। हमें यह स्वीकारना होगा कि हमारे चुप्पी साधे रहने से उनको न तो कोई संकेत मिला न कोई समर्थन, अतः इसके हम उत्तरदायी हैं। मैं बड़ी व्याकुलता से विचार करता हूँ कि हमारे द्वारा पारित प्रस्तावों को, हमारे द्वारा सरकार को भेजे प्रतिवेदनों को तथा हमारी उठाई गई मांगों को वह महत्व क्यों नहीं दिया जाता जो बाकी सब समुदायों की शिकायतों को वही निर्णायक देते हैं और बहुत विचार के पश्चात् मेरा यह मत है कि ऐसा केवल इसलिए है कि हम क्षेत्रीय या प्रादेशिक होकर रह गये हैं। किसी एक प्रदेश की समस्या को वह प्रोत्साहन नहीं जो केन्द्रीय स्तर से उठाई समस्या या मांग को मिलता है। मेरी यह धारणा है कि दलित वर्ग को अपने आप को झंझोंड़ने की आवश्यकता है तथा एक ‘‘अखिल भारतीय दलित संगठन’’ बनाने की आवश्यकता है ताकि हमारी आवाज एक गूंज बन सके और शासन तंत्र में समस्याओं को उठाने तथा निपटाने में हमारी पैठ बने। पिछले दो या तीन वर्षों से एक ‘‘अखिल भारतीय दलित संगठन’’ बना है परन्तु यह एक खुला सत्य है कि उस संगठन में केवल पदाधिकारी हैं सदस्य नहीं हैं। मेरे अपने प्रांत में तो इस संगठन की शाखा का यह हाल है। ऐसी जाली संस्था दलित वर्ग के किसी काम की नहीं। हमारे संगठन में ऐसी जान होनी चाहिए जो दलित वर्ग की भावनाओं को आवाज प्रदान कर सके तथा उससे समुदाय के सच्चे कार्यकर्ता जुड़े हों तथा उसका तंत्र पूरे भारत में हो। यह एक बड़ी उपलब्धि होगी, अगर हम एक छोटी समिति गठित कर उसे संस्था का संविधान का मसौदा बनाने की जिम्मेवारी सौंपे। यह बहुत विचार योग्य बात है और बिना किसी देरी के इस पर कार्यवाही होनी चाहिए।

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  1. सज्जनो, मैंने संभवतः अपनी राजनैतिक शक्ति प्राप्त करने के बारे में आवश्यकता से अधिक ही कह दिया है। परन्तु अब मैं बलपूर्वक कहता हूँ कि दलित वर्ग की सभी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए राजनैतिक शक्ति कोई रामबाण नहीं है। उनकी मुक्ति तो सामाजिक स्तर के उत्थान में है। दलित वर्ग को अपनी बुरी आदतों को छोड़कर स्वच्छ बनना चाहिए। उन्हें अपने बुरे रहन-सहन में सुधार लाना आवश्यक है। उन्हें अपनी जीवन शैली में परिवर्तन लाकर अपने को सम्मानजनक व दूसरों में उनसे मित्रता करने की लालसा बढ़ाने पर बल देना चाहिए। उन्हें शिक्षित होना चाहिए। इसके लिए केवल साधारण अक्षर ज्ञान से काम चलने वाला नहीं क्योंकि हममें से