5. 8.8.1930 एक देश, एक संविधान एक और भाग्य की भावना से जुड़े लोग स्वाधीन होने का जोखिम उठाते हैं। - Page 76

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बहुतों को ज्ञान क्षेत्र में ऊंचाइयाँ छूनी हैं जिससे कि पूरे दलित समाज की

ख्याति उनकी दृष्टि में बढ़े। इस दयनीय संतुष्टि की मानसिकता को समाप्त

करने की आवश्यकता है तथा आत्म उत्थान के लिए अति आवश्यक दैवी

असंतुष्टि की भावना को जागृत करना है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है

दलितों को प्रोत्साहित कर उत्साहित किया जाए कि वे अपना भय पूर्णतया

त्याग कर दूसरे सभी की भांति मानवीय अधिकारों का प्रयोग करें। अपने

हाथों में राजनैतिक शक्ति के आने से इन परिणामों का शुभागमन अपने

आपसे नहीं होगा। हमें यह भली भांति समझ लेना होगा कि राजनैतिक

शक्ति तो केवल परिणाम प्राप्त करने को साधन मात्र है। कहीं दलित वर्ग

यह सोचने की घातक भूल न कर बैठें कि कुछ दलितों के परिषद में स्थान

पा लाने मात्र से ही सब दलितों का उद्धार हो जायेगा तथा वे दलित न

रहेंगे, मैं समय रहते यह चेतावनी देना आवश्यक समझता हूंँ। यह दलितों के

उत्थान का कार्य तो स्वर्गीय गोखले की भारतीय समाज सेवक या स्वर्गीय

लाला लाजपतराय द्वारा स्थापित लोक समाज सेवक संस्थाओं को आदर्श

प्रतिमान स्वीकार कर दलित समाज की संस्थाओं का दायित्व बनता है।

  1. निष्कर्षः
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सज्जनो, मुझे खेद है कि निश्चय ही मैंने आपको इस लम्बे वक्तव्य से चिंता में डाल दिया है। मैं हमेशा संक्षिप्तता को ध्येय मानता हूँ फिर भी ऐसे अवसरों पर जहाँ राजनीति से अपरिचित लोग पहली बार महत्वपूर्ण निर्णायक विषयों पर चर्चा कर रहे हों, समस्या के सब पहलुओं को सामने रखना ही उचित होता है। आपका पूरा मार्गदर्शन कर सकने की इच्छा से व्याख्यान इतना लम्बा हो गया। मेरी इच्छा है कि यह हमारी अंतिम सभा न होकर एक महान आन्दोलन की शुरूआत होगी जिसके परिणामस्वरूप हमारे देश में एक ऐसे समाज व राज्य की स्थापना होगी जहां राजनीति, सामाजिक व उद्योग और संपदा विकास क्षेत्रों में समता होगी तथा हमारे लोगों की मुक्ति होगी।

मुझे सम्मानित करने और ध्यापूर्वक सुनने के लिए मैं पुनः आपका धन्यवाद करता हूँ।’’ ख्1,

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