58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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बम्बई दलितों के लगभग 10,000 पुरुष तथा महिलाएं बृहस्पतिवार, 2 अक्तूबर, 1930 को दामोदर ठाकरसे हाल, परेल, बम्बई के बाहर मैदान में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, जो गोलमेज अधिवेशन में दलित लोगों के प्रतिनिधि के रूप में शनिवार को इंगलैंड को प्रस्थान कर रहे थे, को शुभ विदेश यात्रा की बधाई देने एकत्रित हुये। इस सभा में बहुत उमंग दिखी व जिसका सभापतित्व डॉ. पी.जी. सोलंकी ने किया था।
सभापति ने भाषण के प्रारम्भ में ही दलितों के लिए डॉ. अम्बेडकर द्वारा कई प्रकार की सेवाओं के बारे चर्चा की और आश्वस्त किया कि गोलमेज अधिवेशन में दलितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए डॉ. अम्बेडकर से बढ़कर योग्य कोई दूसरा नहीं। उन्होंने अपनी और पूरी जनता की ओर से डॉ. अम्बेडकर की सुखद लम्बी विदेश यात्रा तथा दूरगामी उद्देश्य की सफलता की कामना जताई।
तत्पश्चात श्री शिवतरकर ने डॉ. अम्बेडकर को जनता की शुभकामनायें अपने भाषण के माध्यम से दी ।
इसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने सभा को विस्तार से संबोधित किया। उन्होंने दलितों के राजनैतिक तथा सामाजिक कल्याण संबन्धी विषयों पर दलितों का रुझान बनाये रखने के लिए लगातार प्रचार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने घोषणा की कि दलितों के नेताओं ने उनकी पुरानी पत्रिका को नये नाम ‘‘जनता’’ से पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया है।
डॉ. अम्बेडकर ने इंगलैंड की आगामी यात्रा के संबंध में कहा कि कांग्रेसी कह रहे हैं कि गोलमेज अधिवेशन का कोई लाभ नहीं होगा परन्तु उनका अपना मानना था कि इस अधिवेशन में कुछ अच्छा होना सुनिश्चित है तथा दलितों को तो इससे अवश्य लाभ मिलेगा ही। मैं बम्बई के कांग्रेसियों की कार्यप्रणाली का सहभागी नहीं बन सकता, क्योंकि उसके प्रभाव से हजारों लोग बेरोजगार हो रहे हैं और उससे देश का भी कोई भला नहीं हो रहा।
वे बिना संकोच कह सकते हैं कि दलित भी कांग्रेसी की तरह ही स्वराज्य की मांग करते हैं परन्तु उन्हें और देश के अल्पसंख्यकों को भी देश के नये संविधान में उचित तथा सम्मानजनक अंश मिलना चाहिए। कांग्रेस की सोच ऐसी प्रतीत होती है कि ब्रिटिशों को नये संविधान के अंतर्गत देश के प्रशासन को जैसे का तैसा छोड़कर चले जाने का यह अर्थ है कि सवर्ण उन्नत हिन्दू समुदाय सत्ता में बना रहेगा तथा