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डॉ. अम्बेडकर के जहाज को प्रातः 6 बजे तट पर लगना था। प्रभात से ही उनके समर्थकों तथा प्रशंसकों की अपार भीड़ उनके आने का उत्सुकता से इंतजार कर रही थी। कुछ दलित नेताओं जिनमें राजनैतिक तौर पर गांधी से जुड़े पी. बालू व काजरोलकर भी शामिल थे, ने जहाज पर डॉ. अम्बेडकर के मार्लापण किया तथा उनके मंगल की कामना की।
डॉ. अम्बेडकर तथा उनके सहयात्री मौलाना शौकत अली मोल स्टेशन पर उतरे। करतलों की गड़गडाहट भरी ध्वनि से मुस्लिम नेता व दलित नेता का स्वागत हुआ। मुस्लिम नेता ने मुस्लिमों व दलितों की अपार भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि हर कोई आन्दोलन के सिद्धांत को सर्वोपरि माने और डॉ. अम्बेडकर की आन्दोलन के प्रति निष्ठा की खूब प्रशंसा की। जन समूह ने शौकत अली व डॉ. अम्बेडकर को विशाल जुलूस में बायकुला तक घुमाया।
डॉ. अम्बेडकर अब दलित वर्ग के लिए शक्ति, आशा व महत्वाकांक्षा का एक प्रतीक बन गए थे। यह अब सर्वविदित था कि उनका दमन संभव नहीं था। उन्होंने योग्यतापूर्वक दलितों का नेतृत्व एक नये आयाम तक पहुंचा दिया। दलितों में एक नई शक्ति, नया खून तथा नया जोश स्पष्ट दिखता था। यह शक्ति, दूरदृष्टि व सर्तकता दलितों के भविष्य की कठिनाइयों तथा आपात स्थिति के समय में सहनशक्ति प्रदान करेगी।
उसी शाम परेल, बम्बई में एक अपार जन समूह की सभा में डॉ. अम्बेडकर को 114 संस्थाओं द्वारा एक संबोधन द्वारा सम्मान किया गया।’’ ख्2,
12 फाईल संः 3447/एच/ कीर, पृष्ठ 193 III -32-37