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मैं अपने सही उद्देश्य के मार्ग से तनिक भी विचलित नहीं
होऊंगा (पूना, 28 अप्रैल, 1932)
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर दलित वर्ग प्रतिनिधि गोलमेज अधिवेशन व वर्तमान
सदस्य बालिग मताधिकार समिति मई के शुरू में ‘‘अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी
संघ’’ मुख्य कार्यालय नागपुर के आमन्त्रण पर अपने प्रशंसनीय कार्य के लिए संघ
से सम्मान पत्र भेंट स्वीकार करने नागपुर पधारेंगें।
उसी समय पूना जिले के दलित समाज ने भी उन्हें सम्मान पत्र भेंट करने
का निर्णय लिया है।
सूबेदार आर.एस.घाटगे की अध्यक्षता में एक स्थानीय स्वागत समिति इस
उपलक्ष्य की तैयारियों में लगी है’’ ख्1,
‘‘काम्पटी की सभा के बाद डॉ. अम्बेडकर पूना, शोलापुर तथा निपानी गये, जहां
उन्होंने दलित सभाओं को संबोधित किया। इनमें से पूना का दौरा बहुत महत्वपूर्ण था।
वे 21 मई 1932 की शाम पूना पहुंचे। वहां उन्हें एक जुलूस में घुमाया गया। विशाल
जुलूस में जन समूह रूढि़वादिता के विरुद्ध नारे लगाते हुये अहिल्याश्रम के खुले
आंगन में पहुंचा। वहां डॉ. बी.आर अम्बेडकर को उनके स्वागत में श्री ए.बी. लाठे की
अध्यक्षता में सम्मान पत्र ख्2, भेंट किया गया। लाठे ने गोपनीय बात को जाहिर करते हुए
बताया कि लन्दन में ब्रिटिश राजनेता और उच्च अधिकारी डॉ. अम्बेडकर के बारे में
गुप्त रूप से पूछते थे कि क्या डॉ. अम्बेडकर किसी भारतीय क्रांतिकारी दल से सम्बन्ध
रखते हैं। लाठे ने आगे कहा कि राष्ट्र की देशभक्त कहलाने वाली पत्रकारिता के लिए
डॉ. अम्बेडकर की राष्ट्रद्रोही जैसी छवि बनाना एक बड़ी शर्मनाक बात है। ऐसा सुनने
में आता है कि लाठे ने कभी डॉ. अम्बेडकर को आर्टस महाविद्यालय कोल्हापुर के
प्रिंसिपल पद की प्रस्तावना की थी, उस याद को ताजा करते हुए उन्होंने यह दृष्टांत
दोहराया। उन्होंने डॉ. अम्बेडकर से पूछा कि उन्हें वकालत में कैसी सफलता मिली
है? डॉ. अम्बेडकर ने उत्तर दिया कि उनके अनुसार अगर वे दलित वर्ग को मनुष्यों
की मान्यता दिला सकते हैं तो वे इसे अपनी सफलता मानेंगे। लाठे ने अन्त में कहा
कि डॉ. अम्बेडकर भारत में दलित मानवता के सुधार तथा उन्नति के प्रयास में जुटे
12 टाइम्स आफ इंडिया, 30 अप्रैल, 1932 यह सम्मान पत्र मराठी भाषा में ‘‘पूना जिला दलित संघ द्वारा भेंट किया गया। इस पर 332 पुरुष व 42 मि
हलाओं के नाम छपे थे। - संपादक